पुलिस ने बोला मुसलमान का नाम ले लो दे देंगे आठ-दस लाख रुपए- सुरेश कुमार

पुलिस ने बोला मुसलमान का नाम ले लो दे देंगे आठ-दस लाख रुपए- सुरेश कुमार

लखनऊ। रिहाई मंच ने 2 अप्रैल 2018 को हुए भारत बंद के दौरान शहीद हुए तेरह युवाओं को श्रंद्धांजलि देते हुए आंदोलनकारियों पर से मुकदमा वापस लेने की मांग की। मंच के एक प्रतिनिधिमंडल ने पिछले दिनों मुजफ्फरनगर जेल में बंद उपकार बावरा, विकास मेडियन और अर्जुन के परिजनों से मुलाकात के बाद रासुका (राष्ट्रीय सुरक्षा कानून) हटाने की मांग की।

भारत बंद के दौरान मारे गए अमरेश के पिता से मुलाकात के बाद मंच ने रिपोर्ट जारी किया। इस दौरान प्रतिनिधिमंडल ने मुजफ्फरनगर के ही पुरबालियान में बच्चों के खेल-खेल में हुए तनाव के मामले में रासुका के तहत निरुद्ध किए गए परिवारों से भी मुलाकात की।

रासुका के तहत निरुद्ध मुजफ्फरनगर के अलमसपुर गांव के उपकार बावरा (26) के पिता अतर सिंह (56) बताते हैं कि 2009 में अर्धसैनिक बल से सेवानिवृत होने के बाद अब वे बैंक में नौकरी करते हैं। वे कहते हैं कि बहुजन समाज अपने हक की लड़ाई लड़ता है तो उसके साथ ज्यादती होती है। बहुजन समाज समझते हैं, पूछते हुए कहते हैं कि मूल निवासी। वे बताते हैं कि 2 अप्रैल की घटना के बाद छह मुकदमों में नाम आने पर 12 अप्रैल को उपकार कोर्ट में पेश हुआ और 17 मई को उसके ऊपर रासुका लगा दी गई। इस बाबत उन्होंने सांसद, मुख्यमंत्री, राष्ट्रपति, राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग, राज्यपाल सभी को पत्र लिखकर पूरे मामले से अवगत करवाया था। अब तक उनकी कहीं कोई सुनवाई नहीं हुई और रासुका तीसरी बार 17 फरवरी को फिर बढ़ा दी गई। जबकि उस दौरान मुजफ्फरनगर में ऐसा कुछ नहीं हुआ। उसको जेल गए एक साल होने जा रहे हैं। वो सवाल करते हैं कि रासुका का मतलब यही न कि प्रशासन के अंदर अव्यवस्था फैलाना। इसका मतलब यही न कि एक लड़के से पुलिस प्रशासन व राज्य सरकार डर गई है। वो बताते हैं कि रासुका लगाने से पहले तमाम आला अधिकारियों को वो पत्र द्वारा सूचित कर चुके थे। यही नहीं वो और रासुका में निरुद्ध विकास मेडियन के पिता एससी एसटी आयोग के अध्यक्ष रामशंकर कठेरिया से भी मुलाकात की और बोला कि 2 अप्रैल के भारत बंद का मामला है तो वो अनमने भाव से देखे। वो सवाल करते हैं कि मेरे बेटे ने भड़काऊ बयान दिया हो, आग लगाई हो आखिर क्या गैर कानूनी काम किया जो उसको समाज के लिए खतरा घोषित किया गया है। जेल में वो काफी दिन बुखार से पीड़ित रहा इसको लेकर भी डीएम-एसपी को लेटर भेजा पर कहीं कोई सुनवाई नहीं। पिछली 4 फरवरी को मेरठ मेडिकल उसे भेजा गया जहां उसे न्यूरो को दिखाने के लिए कहा गया। 11 तारीख तक रखने के बाद उसे फिर से मुजफ्फरनगर जेल में डाल दिया गया। बाद में जब दिक्कत बढ़ी तो 19 को जीबी पंत अस्पताल दिल्ली गेट में उसे ले गए। वो बताते हैं कि विकास और अर्जुन की भी तबीयत लगातार खराब चल रही है। उपकार अध्यापक था। श्रीराम कालेज में लैब टेक्निीशियन और पुरकाजी में आईटीआई कालेज में भी पढ़ा चुका है।

जेल से मिलकर लौटी उपकार बावरा की मां रुपेश देवी कहती हैं कि कल बुखार फिर चढ़ा था। उसकी यह हालत है कि वो सही से चल भी नहीं पा रहा है। पूछने पर कि क्या इससे पहले भी कभी उपकार को किसी मामले में जेल भेजा गया है तो वे कहती हैं कि शब्बीरपुर, सहारनपुर में हुई घटना के बाद 9 मई को उसे तब पकड़ा गया जब वो अपने दोस्त विनय के साथ जा रहा था। पुलिस वाले ऑटो में आए और चमार पूछते हुए गाली देने लगे तब उसने विरोध किया तो उसे पकड़ा गया। तकरीबन 58 दिन उसे जेल में रहना हुआ जून के अंतिम में जेल से बाहर आया। उपकार की मां दूसरे दिन जब जेल में उपकार से मुलाकात हुई तो वहां भी मौजूद थी। उपकार से बात करते-करते जेल में मुलाकाती का वक्त खत्म हो गया और उनकी मां उनसे बात न कर सकीं तो हमने उनसे माफी मांगते हुए कहा तो उन्होंने कहा कि हम तो बस आते हैं बेटे को देखने के लिए उसी से सुकून मिल जाता है।

उपकार के पिता कहते हैं कि सामाजिक न्याय, आरक्षण और बहुजनों के लिए संघर्ष की जो आवाज वो उठाते थे उसी को उठाने की वजह से उपकार आज झेल रहा है। वो बेटे की इस हालात के लिए खुद को ही दोषी मानते हैं।

मुजफ्फरनगर के कमल नगर मोहल्ले में छोटी सी जनरल स्टोर की दुकान पर बैठे रासुका में निरुद्ध अर्जुन सिंह (25) के पिता पूरन सिंह (68) कहते हैं कि वो इन दिनों गाजियाबाद जेल में है उसकी हाईस्कूल की परीक्षाएं चल रही हैं। अर्जुन की मोबाइल की दुकान थी। उस दिन बाजार खुला था और वह मोबाइल का सामान लेने नई मंडी की तरफ गया था। वो जब सामान लेने गया तो उसकी स्कूटी में किसी ने आग लगा दी। उसने किसी तरह अपनी स्कूटी आग से बचाई पर उसी दौरान स्कूटी को आग से बचाते हुए उसका फोटो वहां मौजूद किसी मीडिया वाले या अन्य किसी ने ले लिया। कहां वो खुद की स्कूटी बचा रहा था और कहां उस एक फोटो ने ही उसे गुनहगार बना दिया। फिर क्या था उस पर 6-6 मुकदमें ठोक दिए गए और अब उसके बाद रासुका तो पूरे परिवार पर कहर बन कर टूट पड़ा है।

अर्जुन की मां धनवती बताती हैं कि उसकी 5-6 साल पहले शादी हुई थी उसके तीन लड़कियां हैं। वह बड़े दुखी मन से कहती हैं कि जब वह जेल में था तो तीसरी लड़की हुई। 2 अप्रैल को इलाके में झगड़े के बाद थाने वाले पकड़-धकड़ करने लगे। माहौल को देखते हुए दूसरे दिन लड़की को हरिद्वार दोनों बेटे छोड़ने गए। तीन तारीख की रात साढ़े 12 बजे एकाएक पुलिस सटर पीटने लगी अभी हम खोलें कि पुलिस छत के रास्ते और पीछे से किचन में तोड़फोड़ करते हुए घर में आ घुसी। 70-80 पुलिस वाले थे। अर्जुन को पूछते हुए और जब उन्होंने बताया कि वह बेटी को छोड़ने गया है तो उसके पिता को पकड़ लिया और उन्हें जातिगत गांलियां देते हुए बदतमीजी की गई। उनको ले जाकर थाने में बंद कर दिया। वो शुगर के मरीज हैं। उनसे किसी को मिलने नहीं दे रहे थे। जब किसी तरह यह कहा गया कि अगर उनसे उनके परिवार को मिलने नहीं देगें तो कैसे पता चलेगा की क्या चाहती है पुलिस। तब जाकर ब मुश्किल से उन्हें मिलने दिया गया। चार दिन तक इन्हें कोतवाली में रखा गया जबकि हमारा थाना नई मंडी है। जब उन्होंने अर्जुन के फोटो को दिखाते हुए बताया तो 7 अप्रैल को शाम 7-8 बजे नई मंडी पुलिस चोकी पर पुलिस को उसे सौंप दिया गया। पर पुलिस वालों ने उसे जानसठ रोड से साउली के नाले के पास से भागते हुए गिरफ्तारी का दावा किया। 7 से लेकर 9 तारीख तक उसे थाने में रखा और 9 को चलान किया और 4 जून को उसको रासुका के तहत निरुद्ध कर दिया गया।

अर्जुन के भाई बब्लू कहते हैं कि पंजाब नेशनल बैंक में तोड़फोड़ से लेकर तकरीबन 6 मुकदमों उस पर लाद दिए गए। लगभग सभी पर ये सभी मुकदमें लादे गए जबकि इन सभी एफआईआर में अगर घटना स्थल की स्थिति देखेंगे तो वह अलग-अलग है। एक ही वक्त में एक ही आदमी क्या 6-6 जगहों पर रह सकता है। डीएम ऑफिस जाकर राजीव शर्मा डीएम साहब से और कप्तान अनंत देव तिवारी से भी गुहार लगाई। पर किसी ने एक न सुनी। एसएसपी सिटी ओमकार सिंह ने बुलाया कि क्या चाहते हो तो हम लोगों ने अपनी बात रखी तो कहा चलो सोचेंगे। पर कुछ हुआ नहीं। वो बताते हैं कि अर्जुन को दो मामलों में हाईकार्ट से जमानत मिली। एक दिन पुलिस की गाड़ी कई घंटे तक खड़ी रही। बाद में एक सिपाही आया और कहा कि साहब बुला रहे हैं और उन्होंने कहा कि अर्जुन पर एनएसए लगा दिया गया है। रासुका की कार्रवाई को लेकर एडवाइजरी बोर्ड जो लखनऊ में बैठता है वहां लिखित दिया गया पर उसके ऊपर से रासुका नहीं हटाया गया।

रासुका में निरुद्ध विकास मेडियन (22) के पिता डा0 राकेश मेडियन कहते हैं कि बेटे की गिरफ्तारी को लेकर उन्होंने जिलाधिकारी से गुहार लगाई। 9 सितंबर 2018 को उसके ऊपर रासुका लगा दी गई। जेल में वह गंभीर रुप से टाइफाइड से पीड़ित हो गया। विकास मेडिकल स्टूडेंट था। उनके दो बेटों और दो बेटियों में विकास सबसे बड़ा था।

2 अप्रैल को भारत बंद के दौरान अमरेश (22) की हुई हत्या पर उनके पिता सुरेश कुमार कहते हैं कि उनके तीन लड़कों में बीच वाला लड़का अमरेश था। मजदूरी कर अपने परिवार को पालने वाले सुरेश बताते हैं कि उस दिन वह बीमार था। वो और उसका बड़ा भाई मंडी थाना रेलवे स्टेशन गोदाम की तरफ से आ रहे थे। हरिशरण शर्मा दरोगा ने उसे गोली मारी। पर इंस्पेक्टर मदन बिष्ट ने अज्ञात में मुकदमा दर्ज कर अन्य को जेल भेज दिया। पुलिस का दबाव था कि मैं आठ-दस लाख रुपए लेकर किसी मुसलमान का नाम ले लूं। पर मैंने यह प्रस्ताव ठुकरा दिया क्योंकि मैं सच्चाई जानता था और मुझे इंसाफ चाहिए। इस मामले में पुनः जांच के लिए हाईकोर्ट गया और पुनः जांच के आदेश हुए। पर पुलिस ने फिर पुलिस को ही बचाया। अब वो इस मामले को लेकर स्थानीय अदालत में मुकदमा किए हुए हैं। इस बीच उन्होंने एससी-एसटी कमीशन, मानवाधिकार आयोग तक से शिकायत की है पर कहीं से कोई सुनवाई नहीं हुई है।

भारत बंद के बाद गिरफ्तार किए गए मुजफ्फरनगर के नारा गांव के रहने वाले आशु चैधरी ने बताया कि उस दिन सब कुछ संविधान के दायरे में हो रहा था। पुलिस की लाठी चार्ज ने भड़काने का काम किया जिसके बाद गिरफ्तारी हुई। 200 से अधिक लोगों पर मुकदमें दर्ज किए गए और अज्ञात के नाम पर आम जनता से पैसे वसूले गए। आशु को 11 अप्रैल को शाम 6 बजे दंगे का मुख्य आरोपी कहते हुए उठाया गया कि उसने लोगों को दारु पिलाई थी। वो 15 दिन जेल में रहे। उन्हें टार्चर करने की कोशिश की गई। वे बताते हैं कि 2 अप्रैल के दिन राजकीय मैदान मुजफ्फरनगर में काफी लोग इकट्ठा हुए थे। पुलिस ने जब एक लड़के को गोली मारी तो उसके बाद भगदड़ मच गई। इसके बाद 95 लोगों जेल में ठूस दिया गया। 48 लोगों पर एक ही समय में चार-चार एफआईआर अलग-अलग थानों में दर्ज की गई। दुबारा से मुकदमें लादे गए। अमरेश जो मारा गया उसको मारने का झूठा आरोप एक अन्य व्यक्ति पर लगाया गया।

सूबे में रासुका के तहत की जा रही कार्रवाई को लेकर किए जा रहे इस दौरे के दौरान प्रतिनिधिमंडल मुजफ्फरनगर के पुरबालियान में रासुका के तहत निरुद्ध किए गए लोगों के परिजनों से मुलाकात की। पुरबालियान में 21 अगस्त 2018 को खेल-खेल में बच्चों के बीच हुए तनाव के बाद मुस्लिम समुदाय के ऊपर रासुका लगा दिया गया। आफताब (28) पुत्र अली मोहम्मद के चचेरे भाई नूर मोहम्मद और दादा मेहरबान से मुलाकात हुई। वे बताते हैं कि पाल समाज के लोग उसी दिन शाम 5 बजे रिपोर्ट करके आए थे। 9 बजे हम लोग भी थाने गए। मामला निपट गया था। 12 आदमी के खिलाफ एफआईआर दर्ज किया गया था। मामला शांत हो गया था पर इसी बीच आबिद को पाल समाज के लोगों ने पीट दिया जिसके बाद हम लोग थाने रिपोर्ट कराने गए। थाने में जो लोग गए उनको रोक लिया गया।

मुजाहिद बताते हैं कि शमशेर, आफताब और महबूब को बैठा लिया और फिर उन्हें अंदर कर दिया। इसमें पूर्व प्रधान संतोष पाल की भूमिका थी। सांसद संजीव बालियान के बायान के बाद फिर पुलिस आई और लठ्ठ बजाना शुरु किया। महिलाओं और बच्चों तक को निशाना बनाया गया।

गांव वालों ने बताया कि शमशेर (60) पुत्र सुलेमान, महबूब (40) पुत्र सरुमुद्दीन, आफताब (28) पुत्र अली मोहम्मद और यामीन (60) पुत्रि समयदीन को रासुका के तहत निरुद्ध कर दिया गया।

भारत बंद को बहुजन संकल्प दिवस कहते हुए पूर्व संध्या पर लखनऊ स्थित पिछड़ा समाज महासभा के कार्यालय से मुजफ्फरनगर में रासुका के तहत निरुद्ध युवाओं को लेकर रिपोर्ट जारी की गई। वक्ताओं ने कहा कि जिस तरीके भारत बंद के बाद पकड़े गए लोगों पर मोदी-योगी सरकार में रासुका के तहत कार्रवाई की गई वो साफ करता है कि हक-हुकूक के लिए जब बहुजन समाज सड़क पर आएगा तो मनुवादी सरकार उसे राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरा कहेगी। सवाल किया कि आखिर सूबे में दलित और मुस्लिम पर ही रासुका के तहत क्यों कार्रवाई की जा रही है। क्या दलित-मुस्लिम ही राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरा है। लोकसभा चुनाव में भारत बंद के दौरान दर्ज किए गए मुकदमों पर राजनीतिक दलों की चुप्पी शर्मनाक है। राजनीतिक दल इस पर अपनी स्थिति स्पष्ट करें। इस मौके पर एहसानुल हक मलिक, बांके लाल यादव, शाहरुख अहमद, राॅबिन वर्मा, शिव नारायण कुशवाहा, रजनीश भारती, राजीव यादव मौजूद रहे। मुजफ्फरनगर दौरे में राजीव यादव, रविश आलम, जाकिर अली त्यागी और अबूजर चैधरी शामिल रहे।
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