भारत के मुसलमान उन दलितों से भी बदतर स्तिथि में...

भारत में रहने वाले मुसलमान पूरी दुनिया के मुसलमानों से अधिक खुशहाल?

मोहम्मद ज़ाहिद 
एक परसेप्शन बना दिया गया है जिसे आप अक्सर सुनते होंगे। "भारत में रहने वाले मुसलमान पूरी दुनिया के मुसलमानों से अधिक खुशहाल हैं"

सुना होगा आपने ?

जबकि हकीकत यह है कि जिन दलितों को सबसे अधिक वंचित मान कर 1947 से आरक्षण और एससी/एसटी ऐक्ट का प्रोटेक्शन दिया जा रहा है , जस्टिस सच्चर आयोग के अनुसार भारत के मुसलमान उन दलितों से भी बदतर स्थीति में हैं।

बताईए , दोनों चीज़ें एक साथ कैसे हो सकती हैं ? पर इसके बावजूद आप अक्सर यह सुनेंगे कि भारत का मुसलमान दुनिया का सबसे सुरक्षित और खुशहाल मुसलमान है और ऐसे ही परसेप्शन पर लोग तुरंत विश्वास कर लेते हैं कि हाँ ऐसा ही है।

जबकि यह झूठ है

ऐसा ही कुछ यह मान लिया गया कि बाबरी मस्जिद , बाबर ने रामजन्मभूमि मंदिर गिरा कर बनाई , जबकि बाबर कभी अयोध्या गया ही नहीं , बाबरी मस्जिद तो बाबर के सेनापति मीर बाकी ने बनवाई।

बाबरी मस्जिद का पूरा मामला "परसेप्शन" गढ़ने और लोगों के मन में इसे बिठा देने का मामला है और कुछ नहीं।

बाबरी मस्जिद के अतिरिक्त केवल और केवल अयोध्या में "रामकोट" के साथ साथ 6 जगह ऐसी है जहाँ राम के जन्म स्थान की मान्यता मान कर पूजा की जाती है और हर जगह श्रृद्धालू अपने सर झुका देते हैं , बिना यह समझे कि राम जी 6 स्थानों पर कैसे पैदा हो सकते हैं ?

राम जी का एक जन्मस्थान हरियाणा के "कुरुक्षेत्र" में भी है और वहाँ एक "रामजन्म स्थान" मंदिर भी है , जिसकी मान्यता का आधार यह है कि "कुरुक्षेत्र" चुँकि रानी कौशल्या का मायका था तो अपने पहले बच्चे को जन्म देने वह अपने मायके कुरुक्षेत्र आकर इसी स्थान पर राम जी को जन्मी थीं।

इसके अतिरिक्त , कंबोडिया , पाकिस्तान के डेरा इस्माइल खान और थाइलैंड में भी राम जी का जन्मस्थान है , थाइलैंड में तो पूरी अयोध्या ही है जिसे युनेस्को ने भारत की आपत्ती खारिज करते हुए प्रमाणित की।

कभी कभी सोचता हूँ कि क्या बहुसंख्यकों की श्रृद्धा इतनी कमज़ोर होती है कि वह किसी भी कारण से किसी भी जगह के प्रति पैदा हो जाती है या करा दी जाती है ?

जैसे "बाबरी मस्जिद" में राम जन्म स्थान के प्रति पैदा करा दी गयी , यह सवाल यह श्रृद्धालू पूछते भी नहीं कि राम जी के त्रेतायुग के 10 लाख साल तक बाबरी मस्जिद की ज़मीन रामजन्म भूमि क्युँ नहीं थी जबकि इसका विवाद ही कुल 100 साल पुराना मात्र है ? और रामजन्म भूमि तो उसे भी 1987 में बताया गया जबकि इसके पूर्व की किसी पुस्तक या गोवलकर सावरकर हेडेगवार मुखर्जी और उपाध्याय ने कभी कहीं रामजन्मभुमि का अपनी सैकड़ों किताबों में कहीं उल्लेख भी नहीं किया।

ना ही 1987 के पहले की किसी इतिहासकार या इतिहास की पुस्तक में यह उल्लेख है कि राम जी बाबरी मस्जिद वाली जगह ही पैदा हुए।

दरअसल , यह परसेप्शन गढ़ा अटल-आडवाणी और संघ ने 1987 में जब कि बाबरी मस्जिद और राम चबूतरे के एक मामूली से विवाद को हवा दी और उसी जगह "राम जन्म स्थान" घोषित कर दिया गया।

यह अडवाणी अटल और संघ भी जानता है कि यह झूठ है और बाबरी मस्जिद में रामजन्म भूमि की सारी अवधारणा काल्पनिक और राजनैतिक है जो कि 1987 में गढी गयी।

आइए समझते हैं कि बाबरी मस्जिद का जब पहला विवाद शुरू हुआ तो वह विवाद क्या था और क्या उस समय बाबरी मस्जिद में राम जन्म स्थान को लेकर कोई बात की गयी ?

जवाब होगा , बिल्कुल नहीं ,

अदालत में उपलब्ध साक्ष्य के अनुसार ही अंग्रेजों के शासनकाल के दौरान 1885 में महंत रघुवीर दास ने फैजाबाद न्यायालय में एक मुकदमा दायर किया था। उसमें कहा गया था कि "जन्म स्थान एक चबूतरा है" जो मस्जिद से अलग उसके सामने है जिसकी लंबाई पूर्व-पश्चिम इक्कीस फिट और चौड़ाई उत्तरदक्षिण सत्रह फीट है।

इस चबूतरे की महंत स्वयं और हिंदू इसकी पूजा करते हैं। इस दावे में यह भी कहा गया था कि यह चबूतरा चारों ओर से खुला है। सर्दी-गर्मी और बरसात में पूजा करने वालों को कठिनाई होती है। इस लिए इस पर मंदिर बनाने की अनुमति दी जाए। सरकार ने मंदिर बनाने से रोक दिया है।इसलिए न्यायालय सरकार को आदेश दे कि मंदिर बनाने दे।

सरकारी अभिलेखों और अदालती कार्यवाही में दर्ज है कि 24 दिसंबर 1885 को फैजाबाद के सब जज पं. हरिकृष्ण ने महंत रघुवीरदास की अपील यह कहते हुए खारिज कर दी थी कि बाबरी मस्जिद के सामने मंदिर बनाने की इजाजत देने से हिंदू-मुसलमान के बीच झगड़े और खून खराबे की बुनियाद पड़ जाएगी।

फैसले में यह भी कहा गया था कि मंदिर मस्जिद के बीच एक दीवार है जो दोनों पूजा स्थलों को एक-दूसरे से अलग साबित करती है। मंदिर और मस्जिद के बीच की यह दीवार 1857 से पहले बनाई गई थी। फैजाबाद के सब जज हरिकृष्ण के फैसले के खिलाफ ‘राम जन्म स्थान’ के महंत रघुवीर दास ने फैजाबाद के जिला जज कर्नल जे आर्य के यहां अपील की। इसके मुआयना करने के बाद 16 मार्च 1886 को उस अपील को भी खारिज दिया गया।

कहने का अर्थ यह है कि बाबरी मस्जिद को लेकर पहला मुकदमा किसी भी कारण से जब किया गया तब रामजन्म भूमि को बाबरी मस्जिद में नहीं बल्कि उससे दूर एक "इक्कीस फिट तथा चौड़ाई सत्रह फीट के चबूतरे को बताया गया था और यह प्रमाण फैजाबाद की अदालत में सुरक्षित है।

अर्थात 1857 में बाबरी मस्जिद के किसी गुंबद के नीचे रामजन्म भूमि की बात महंत रघुवीर दास ने भी नहीं की।

जिला जज के इस फैसले के खिलाफ महंत रघुवीर दास ज्यूड्शिनल कमिश्नर के पास अपील करने गये, जिसके पास पूरे अवध के लिए हाईकोर्ट के समान अधिकार थे, उन्होंने भी अपने फैसले के जरिए इस अपील को एक नवंबर 1886 को खारिज कर दिया। पूरे प्रकरण की कापी कोई भी अदालतों से प्राप्त कर सकता है।

अर्थात महंत रघुवीर दास ने 1886 में भी यह दावा नहीं किया कि बाबरी मस्जिद ही राम जन्मभूमि स्थान है , उनके अनुसार "जन्म स्थान" रामचबूतरा है जो बाबरी मस्जिद की चार दिवारी से अलग था।

खैर , इस फैसले के बाद बाबरी मस्जिद में नमाज पढ़ी जाती रही और राम जन्म स्थान मान कर "चबूतरे" पर हिन्दू पूजा अर्चना करते रहे। हिंदू-मुस्लिम के बीच कभी कोई विवाद नहीं हुआ। सन 1934 में गो-वध को लेकर अयोध्या में एक दंगा हुआ, जिसमें बाबरी मस्जिद की एक दीवार को छति पहुंची। जिसे सरकार ने अपने खर्चे से बनवा दिया।

आजादी 1947 को मिली और अंग्रेजी हुकूमत की दहशत कट्टरपंथी हिन्दू अतिवादी संगठनों के हृदय से भी दूर हुई । और यहीं से बाबरी मस्जिद के खिलाफ साजिशें शुरु हुईं जो अंग्रेजों की हुकूमत में सम्भव नहीं थीं।

साल 1949 की बात है। आजाद भारत की उम्र कुल मिलाकर दो साल ही हुई थे। देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू अभी भी भारत के विचार को साकार करने में लगे हुए थे और उनके सहयोगी सरदार वल्लभभाई पटेल देश की सीमाओं को परिभाषित कर रहे थें। 1949 में देश भले ही आजाद हो गया था लेकिन विभाजित भारत के लोग अभी भी विभाजन की त्रासदी में तार-तार हुए सामाजिक ताने-बाने के चीथड़ो को समेटने की कोशिश कर रहे थे।

इन्हीं सबके बीच भारत में ज़हर फैलाने की ज़मीन तैयार की जा रही थी और उसके लिए चुना गया उत्तर प्रदेश की अयोध्या को, जहां बहुसंख्यकों के श्रद्येय भगवान पुरुषोत्तम राम का कभी शासन चलता था और जिसे लेकर सनातन धर्म के लोगों में जबरदस्त धार्मिक भावना रही है। उसी धार्मिक भावना का राजनैतिक दोहन करने के लिए 22 दिसंबर 1949 की रात को अयोध्या घेरने की तैयारी कर ली गई।

बाबरी मस्जिद को लेकर सबसे बड़ी साजिश से जुड़ी एक जमीनी व्याख्या 23, दिसंबर 1949 को दर्ज हुई एफआईआर में है। इस घटना की सूचना संबंधित थाने के कांस्टेबल माता प्रसाद ने थाना इंचार्ज राम दुबे को दी। उसमें अयोध्या के पुलिस स्टेशन के ऑफिसर इंचार्ज ने मुख्य रूप से तीन लोगों को नामजद किया था- अभिराम दास, राम शकल दास और सुदर्शन दास। इसके अलावा 50 से 60 अज्ञात लोगों के खिलाफ भी दंगा भड़काने, अतिक्रमण करने और एक धर्मस्थल को अपवित्र करने का मामला दर्ज किया गया था।

इस एफआईआर का क्या हुआ आज तक किसी को पता नहीं। दरअसल ये वही लोग थे जिन्होंने बाबरी मस्जिद में घुसकर विवाद को जन्म दिया। जबकि उसके पहले श्रीराम जी के जन्मस्थान की चौहद्दी अलग-अलग स्थानों की बताई जाती रही। उसमें एक चौहद्दी ‘रामकोट’ की भी है। खुद देखिए उस एफआईआर की भाषा जो सरकारी अभिलेखों में दर्ज हुई। ध्यान रखियेगा कि यह अभिलेख स्वतंत्र भारत के सरकारी अभिलेख में दर्ज एक एफआईआर है, न कि मुगल औरंगजेब के शासन काल के अभिलेख में दर्ज कोई फरमान।

"50 से 60 लोगों का एक समूह बाबरी मस्जिद परिसर के ताले को तोड़कर, दीवारों और सीढ़ियों को फांदकर अंदर घुस आए और श्रीभगवान की प्रतिमा स्थापित कर दी। साथ ही उन्होंने पीले और केसरिया रंग में सीता और रामजी आदि की तस्वीरें मस्जिद के भीतरी और बाहरी दीवारों पर बना दी। मस्जिद में घुसपैठ करनेवालों ने मस्जिद को नापाक किया।"

यह है पुलिस द्वारा दर्ज की एफआईआर , जिसमें "रामजन्मभूमि" का कोई ज़िक्र नहीं बल्कि "बाबरी मस्जिद" ही कहा गया।

कहने का अर्थ यह है कि भारत सरकार और सरकारी अभिलेखों में भी 1987 के पहले बाबरी मस्जिद को कभी रामजन्म भूमि नहीं माना गया , जबकि जो विवाद था वह चबूतरे के स्थान पर मंदिर बनाने के लिए था।

तो सवाल यह है कि क्या सनातन धर्म की धार्मिक आस्था झूठ और साजिश के आधार पर राजनैतिक कारण से कहीं और किसी भी स्थान के प्रति पैदा की जा सकती है ?

बाबरी मस्जिद प्रकरण देख कर जवाब "हाँ" ही होगा।

तो क्या सनातन धर्म की आस्था और विश्वास अटल-आडवाणी और संघ तय करेगा या वेद पुराण ?

आज का दौर देख कर कहा जा सकता है कि

"अटल-आडवाणी और संघ"।

सारा मामला परसेप्शन गढ़ कर उसके प्रति आस्था पैदा कराने का है , तो यह कैसी धार्मिक आस्था है जो कोई भी पैदा करा सकता है ? यह समझना महत्वपुर्ण होगा। कहना उचित होगा कि लाखों साल के सनातन धर्म की आस्था मात्र कुछ साल से किसी जमीन के प्रति कैसे पैदा की जा सकती है , बाबरी मस्जिद इसका उदाहरण है।

आज बाबरी मस्जिद को शहीद हुए "26" साल हो गये , और जन्मस्थान के इस गढ़े परसेप्शन से डर कर उच्चतम न्यायालय तक इसकी सुनवाई और फैसला देने में डरने लगी है क्युँकि संघ , अटल-आडवाणी ने जो श्रृद्धा पैदा कर दी उसके विरुद्ध जाने की हिम्मत उच्चतम न्यायालय की भी नहीं। इसी लिए 26 साल बाद भी अदालत मात्र यह निर्णय कर पाई है कि बाबरी मस्जिद शहीद करने वालों पर मुकदमा किस धारा के अंतर्गत चलाया जाए।

सोचिएगा कि क्या रामलला झूठ और लाशों पर खड़े एक मंदिर के मोहताज हो चुके हैं ? और यदि हाँ तो उनको इस असहाय स्थीति में लाने वाला कौन है ?
(लेखक सोशल मीडिया एक्टिविस्ट हैं, ये उनके निजी विचार हैं)
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