गरीबी, अशिक्षा, बेरोज़गारी! रूढ़िवादिता और आधुनीकरण की कशमकश में पिसती मुस्लिम पीढ़ी

गरीबी, अशिक्षा, बेरोज़गारी! रूढ़िवादिता और आधुनीकरण की कशमकश में पिसती मुस्लिम पीढ़ी

मौहम्मद अवेश
संयुक्त राज्य अमेरिका में धार्मिक रिसर्च संस्था प्यू द्वारा आबादी को लेकर किये गये सर्वे की रिपोर्ट दावा करती है कि दुनिया की लगभग साढ़े सात अरब मिश्रित आबादी में लगभग हर चौथा इन्सान मुसलमान हैं। इस समय इस्लाम धर्म माननेवालों की आबादी ईसाई के बाद दूसरे नंबर पर है। अगर आबादी की यह गति यूं ही बढ़ती रही तो इस शताब्दी के आखिर तक मुसलमानों की आबादी ईसाई से भी आगे निकल जाएगी। लेकिन इसमें खुश होने जैसी कोई भी बात नहीं होनी चाहिए; क्योंकि जो व्यक्ति इंसानियत से मुहब्बत करता है वह कभी भी लोगो को गरीब, अशिक्षित और असुरक्षित नही देखना चाहेगा।

इसमें कोई भी दोराय नही कि आज के मुसलमान तकनीकी और राजनीतिक रूप से पिछड़े हुए तथा हाशिए पर खड़े आर्थिक रूप से गरीब लोग हैं। यह बड़े ही सोच का विषय है कि दुनियाभर की कुल 790 खरब डालर की अर्थव्यवस्था में मुस्लिमो का सिर्फ 20 खरब डालर का ही योगदान है, जो फ्रांस जैसे एक छोटे देश की जीडीपी (सकल घरेलू उत्पाद) से भी कम है। एक और तथ्य जो सोचने पर मजबूर करता है कि दुनिया की 35 प्रतिशत आबादी वाले ईसाई दुनिया की सम्पूर्ण सम्पत्ति का 70 प्रतिशत हिस्सा रखते है।

आज के दौर में विज्ञान और प्रौद्योगिकी में मुसलमानों का योगदान, आविष्कार नगण्य है। आम तौर पर प्रतिवर्ष मुसलमान प्रसिद्ध शोध पत्रिकाओं के लिए लगभग 500  शोधपत्र प्रकाशित करते हैं, जो स्वयं में केवल इंग्लैंड से प्रकाशित शोध का 1/6 हैं। 1901-2008  के बीच कुल 500 नोबेल पुरस्कारों में से 140 नोबल पुरस्कार यानि कि दुनिया के 25 प्रतिशत नोबल प्राप्त करने का गौरव उन यहूदियों को प्राप्त है जो दुनिया की आबादी का केवल 0.2 प्रतिशत है। और वही पर सिर्फ 10 मुसलमानों को आज तक इस पुरस्कार को करने का अवसर मिला है।

द गार्डियन लिखता है कि मलेशिया के एकमात्र इस्लामी विश्वविद्यालय को छोडकर दुनिया के 150 सर्वश्रेष्ठ विश्वविद्यालयों की सूची में एक भी मुस्लिम विश्विद्यलय नही है। जबकि सातवीं शताब्दी से सोलहवीं शताब्दी तक, दुनिया के सबसे बड़े स्कूल और विश्वविद्यालय मुस्लिम देशों में स्थित थे। विज्ञान के प्रसिद्ध इतिहासकार, गिलेस्पी ने मध्यकालीन युग में दुनियाभर के 130 महान वैज्ञानिकों और तकनीशियनों को सूचीबद्ध किया था,  जिसमे से 120 साइंसदान सिर्फ मुस्लिम देशों के थे और केवल चार यूरोप से थे। क्या यह तथ्य मुसलमानों को अपने अतीत के मूल्यांकन करने और भविष्य को तार्किक तरीके से सोचने पर मजबूर करने के लिए काफी नही है?

विभिन्न संस्थानों द्वारा किए गए शोध के आधार पर कुछ और दिलचस्प तथ्य बताते हैं कि मुस्लिम समाज और देशों में बेरोजगारी और आर्थिक गरीबी, अगले 50 वर्षों में आगे बढ़ेगी। जैसे की प्यु की रिपोर्ट दावा करती है कि यदि अगले पचास वर्षों में मुस्लिम आबादी दोगुना हो गई , तो मुस्लिम और ईसाई देशों के बीच आर्थिक विकास अंतर बहुत बड़ा हो जायेगा। एक सवाल है कि आने वाली शताब्दी में दुनिया पर 5 प्रतिशत संसाधनो वाले मुसलमानों या फिर 70 फीसदी संसाधनों और सम्पत्ति वाले इसाई कौम का प्रभुत्व होगा? यह याद रखना होगा कि आज के वैज्ञानिक विकास द्वारा परिभाषित दुनिया में किसी भी देश या कौम का सम्मान और शक्ति, इसकी आबादी पर आधारित नहीं है। आज सिर्फ और सिर्फ विज्ञान और प्रौद्योगिकी में विकास शक्ति, सम्मान और संसाधनों की गारंटी है। यहूदी देश इज़राइल को देखिये,  एक छोटा सा देश पूरे अरब दुनिया पर हावी है क्योंकि यह एक आर्थिक, रणनीतिक और वैज्ञानिक रूप से समृद्ध देश है, जिसके खिलाफ वैज्ञानिक रूप से पिछडे अरब को झुकना पड़ता है और हार माननी पड़ती है। एक तरफ, पश्चिमी देशों में रहने वाले मुस्लिम उनकी समृद्धि से खुश हैं, जबकि मुस्लिम बहुमत वाले देशों के मुसलमान वित्तीय पिछड़ेपन में डूबे हुए हैं। यूरोप में रहने वाले 20 मिलियन मुस्लिमों का सकल घरेलू उत्पाद पूरे भारतीय महाद्वीप के 500 मिलियन मुस्लिमो से अधिक है।

असल में, शिक्षा का पतन, मुसलमानों सीखने की तरफ से रुझान का हटना, उनके आर्थिक और राजनीतिक गिरावट का मुख्य कारण है। हमने सदियों से मानवता के नेतृत्व को छोड़ दिया है और रूढ़िवादी सोच ने हमें अलग थलग कर दिया है। वह दिन बहुत करीब है जब मुसलमान उन्हें दुनिपर एक बोझ रूप में महसूस करेंगे। मलेशिया के प्रधान मंत्री महाथिर बिन मोहम्मद ने ओआईसी की बैठक कहा था कि मुसलमानों को सामाजिक परिस्थितियों में बदलाव के परिणामस्वरूप नए युग में एक नई पहचान बनाने के लिए अपने रूढ़िवादी रवैय्ये को छोड़ना चाहिए।

वह भी एक समय था जब मुसलमानों ने 8वीं -14वीं शताब्दी के बीच स्पेन पर शासन किया, स्पेन की आय यूरोप के बाकी हिस्सों से अधिक थी क्योंकि उस वक्त स्पेन उच्च शिक्षा का केंद्र था। आज परिस्थिति एक दम उलट है, आज के ईसाई स्पेन का सकल घरेलू उत्पाद तुलनात्मक रूप से बारह पेट्रोलियम निर्यात मुस्लिम देशों से कहीं अधिक है। मुस्लिम शासन के दौरान सभी देशों के पास एक अच्छा समय था; बगदाद, दमिश्क, काहिरा और त्रिपोली अपनी वैज्ञानिक दृष्टि के लिए प्रसिद्ध थे। इन मध्ययुगीन शताब्दियों में, मुस्लिम देशों को आर्थिक रूप से, सांस्कृतिक और बौद्धिक रूप से विकसित माना जाता था। वास्तविकता यह है कि जब मुस्लिम देशों में विज्ञान की आंधी चल रही थी, तो यूरोप अंधेरे में जी रहा था। शुरुआती दौर का इस्लाम दुनिया पर हावी था।

फिर धीरे-धीरे 16वीं शताब्दी की शुरुआत के साथ स्थिति बदलनी शुरू हो जाती है, मुस्लिम समुदाय विज्ञान और शिक्षा से दूर होता जाता है और निष्क्रिय हो जाता है जबकि ईसाई जनता मुस्लिम विज्ञान की ओर उन्मुख थीं। मुस्लिम समुदाय, जिसने पूरी दुनिया को आठ सौ वर्षों तक जीवित रखा, आखिरकार उभरते यूरोप के सामने घुटने टेक गया। इस संदर्भ में, एक महान इस्लामवादी मौलाना अबुल हसन अली नदवी का बयान बहुत प्रासंगिक है कि सोलहवीं शताब्दी के बाद, मुसलमानों ने तर्क और विज्ञान छोड़ दिया। इसलिए, इस समाज में कोई महान व्यक्तित्व उभरा नहीं, और मुसलमान अपनी पारंपरिक जीवनशैली में फंस कर रह गए । कुछ समय पहले, सैमुअल हंटिंगटन ने दावा किया था कि पश्चिम और मुस्लिम देशों के बीच विवाद दो सभ्यताओं के बीच विवाद था जो बिल्कुल गलत है। यह विवाद अमीर और गरीब देशों का है, विकसित राष्ट्र तानाशाही करना चाहते है जिसके परिणामस्वरूप गरीबों को पिसना पड़ता है।

दुनिया के गरीब देशों को अमीर देशों के साथ विशेष रूप से धर्म के नाम पर लड़ाई से न सिर्फ बचना चाहिए बल्कि इनके परिणामो की समीक्षा भी करने की जरूरत है। मुस्लिम समुदाय के सुधार के लिए एकमात्र तरीका वैज्ञानिक मार्गों जैसे कि ‘यूरोप के पुनर्जागरण’ को पकड़ना है और वह भी आज के यूरोप से उच्च गति में। सबसे पहले मुसलमानों को अपने दिमाग के साथ मौलिकता और अतिवाद को उखाड़ फेंकना होगा और सच्चे इस्लाम के शासन के तहत, भाईचारे और सहिष्णुता को अपनाया जाना चाहिए। दुनिया के धर्मों में आपसी सद्भाव को बढ़ावा देने के लिए हाल ही में उठाये गये कदम को लेकर कुछ अरब देशों की सरकारों की सराहना की जानी चाहिए, इनके परिणाम निश्चित रूप से दूरगामी हैं। एक सम्मेलन के दौरान, सऊदी अरब के बादशाह अब्दुल्ला ने कहा था कि इस्लाम को अतिवाद से दूर रहना चाहिए, कुछ मुस्लिमों ने कट्टरवाद के संरक्षण के तहत सच्चे इस्लाम को धोखा दिया है। हमें पूरी दुनिया को बताना है कि इस्लाम मानवता की आवाज़ है, सहिष्णुता और शांति का समर्थक है।

आइये विश्व शांति के लिए में पश्चिम के साथ कंधों से कंधे मिलाकर आआगे बढ़े, कुछ उपयोगी बातचीत के तरीके ढूंढें, युद्ध संघर्ष किसी को भी लाभ नहीं पहुंचाएगा; तरक्की सिर्फ अमन से हासिल होगी।

(लेखक मोतीलाल नेहरु राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी संस्थान इलाहाबाद के यांत्रिकी अभियंत्रण विभाग में शोधकर्ता हैं)
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