सदियों तक संजो कर रखने लायक है भाई दूज पर्व की भावनात्मक परंपरा

सदियों तक संजो कर रखने लायक है भाई दूज पर्व की भावनात्मक परंपरा

ध्रुव गुप्त 
कार्तिक शुक्ल पक्ष की दूसरी तिथि यम द्वितीया दीपोत्सव के पांच-दिवसीय आयोजन की आखिरी कड़ी है। लोक भाषा में इस दिन को भैया दूज भी कहा जाता है। दीपोत्सव का यह दिन भाई-बहनों के आत्मीय रिश्ते के नाम समर्पित है। बहनों का अपने भाईयों से रिश्ता बड़ा अजीब होता है ! एक ही जीवन में यह रिश्ता कई-कई रूप अख्तियार करता है।

बहनों का पूरा बचपन अपने भाईयों से लड़ते झगड़ते बीत जाता है। साथ रहें, साथ खाएं या साथ खेलें - एकदम दुश्मनों वाला सलूक ! खिलौनों के लिए झगड़ा। चॉकलेट और लॉलीपॉप के लिए झगड़ा। किताबों और कॉपियों के लिए झगड़ा। पर्व-त्योहारों में अपने हिस्से के कपड़ों और उपहारों के लिए झगड़ा। फिर लड़ते-झगड़ते जाने कब वे सयानी हो जाती हैं और भाईयों की फ़िक्र करने लगती हैं।

किसी चीज़ में हिस्सा मांगना तो दूर, अपना हिस्सा भी भाईयों को इत्मीनान से सौंप देती हैं। ससुराल जाकर भाईयों को अपनी प्रार्थना और प्रतीक्षा में शामिल कर लेती हैं। साल दर साल भाईयों का इंतज़ार करती हैं। यह जानते हुए भी कि दुनियादारी में व्यस्त भाईयों को अपने काम और परिवार से फुर्सत मिलने की संभावना कम ही होती है। बुढ़ापे में बहनें सीधे मां की भूमिका में उतर जाती हैं। बूढ़े भाईयों पर बात-बात में हिदायतें भी पहुंचाई जाती हैं और डांट-फटकार भी।

भैया दूज भाई-बहन के इसी नैसर्गिक, आत्मीय रिश्ते की याद दिलाने वाला लोक-आस्था का अनूठा पर्व है। जहां रक्षा बंधन या राखी सभी उम्र की बहनों के लिए अपने भाईयों के लिए प्रार्थना का पर्व है, भैया दूज की कल्पना मूलतः विवाहित बहनों की भावनाओं को ध्यान में रखकर ही की गई है। इस दिन भाई बहनों की ससुराल जाकर उनसे मिलते हैं, उनका आतिथ्य स्वीकार करते हैं और बहनें उनकी लम्बी आयु की प्रार्थना करती हैं।

हमारी संस्कृति में किसी भी रीति-रिवाज या रिश्ते को स्थायित्व देने के लिए उसे धर्म और मिथकों से से जोड़ने की परंपरा रही है। यम द्वितीया के लिए भी पुराणों ने एक मार्मिक कथा गढ़ी है। कथा के अनुसार सूर्य के पुत्र और मृत्यु के देवता यमराज का अपनी बहन यमुना से अपार स्नेह था। यमुना के ब्याह के बाद स्थितियां कुछ ऐसी बनीं कि बहुत लम्बे अरसे तक भाई-बहन की भेंट नहीं हो सकी। यमुना भाई को बराबर निवेदन भेजती रही कि वह किसी दिन उसके घर आकर उसका आतिथ्य स्वीकार करे। कार्य की व्यस्तता के कारण यम कभी बहन के लिए समय नहीं निकाल सके। अंततः कार्तिक शुक्ल पक्ष की द्वितीया तिथि को यम एक बार बहन के घर पहुंच ही गए। यमुना ने दिल खोलकर भाई की सेवा की। उन्हें तिलक लगाने के बाद अपने हाथों का बनाया भोजन कराया। प्रस्थान के समय स्नेह और सत्कार से अभिभूत यम ने बहन से कोई वरदान मांगने को कहा। यमुना ने अपने लिए कुछ नहीं मांगा। उसने दुनिया की तमाम बहनों के लिए यह वर मांग लिया कि आज के दिन जो भाई अपनी बहन की ससुराल जाए और यमुना के जल में या कम से कम या बहन के घर में स्नान कर उसके हाथों से बना भोजन करे, उसे यमलोक का मुंह कभी नहीं देखना पड़े।

यम और यमुना की यह पौराणिक कथा काल्पनिक ही सही, लेकिन इस कथा में अंतर्निहित भावनाएं काल्पनिक कतई नहीं है। इस कथा के पीछे हमारे पूर्वजों का उद्देश्य निश्चित रूप से यह रहा होगा कि भैया दूज के बहाने ही सही, भाई साल में कम से कम एक बार अपनी प्रतीक्षारत बहन की ससुराल जाकर उससे जरूर मिलें। बहन के हाथों का बनाया भोजन ग्रहण करे और उसे उपहार में अपनी सामर्थ्थ के अनुसार अन्न, वस्त्र और आभूषण दे। बरस भर बाद भाई-बहन मिलेंगे तो इस रिश्ते का नवीकरण होगा। बचपन और किशोरावस्था की यादें ताज़ा होंगी। विगत स्मृतियां बोलेंगी। प्रेम भी बरसेगा, उलाहने भी। हंसी भी छूटेगी और आंसू भी टपकेंगे। अपनी सगी बहन न हो तो रिश्ते की किसी चचेरी, ममेरी, फुफेरी या मौसेरी बहन की ससुराल जाकर उसका आतिथ्य स्वीकार करने का प्रावधान है। वह भी नहीं हो तो किसी नदी में स्नान करने के बाद उस नदी के किनारे या गाय के पास बैठकर भोजन कर ले।

बिहार और पूर्वी उत्तर प्रदेश में इस दिन बहनें भाईयों को तिलक लगाने के बाद मिठाई के साथ 'बजरी' अर्थात कच्चे मटर या चने के दानें भी खिलाती हैं। बिना दांतों से कुचले सीधे-सीधे निगल जाने की सख्त हिदायत के साथ। ऐसा करने के पीछे बहनों की मंशा अपने भाईयों को बज्र की तरह मजबूत बनाने की होती है। भाई दूज के दिन विवाहित स्त्रियों द्वारा गोधन कूटने की प्रथा भी है। गोबर की मानव मूर्ति बनाकर स्त्रियां उसे मूसलों से तोड़ती हैं। यमराज और यमुना की पूजा करती हैं। दोपहर तक यह सिलसिला चलता है। संध्या के समय यमराज के नाम से दीप जलाकर घर के बाहर रख दिया जाता है। यदि उस समय आसमान में कोई चील उड़ता दिखाई दे तो माना जाता है कि भाई की लंबी उम्र के लिए बहन की दुआ कुबूल हो गई है। जैसा कि हर पर्व के साथ होता आया है, कालांतर में भैया दूज के साथ भी पूजा-विधि के बहुत सारे कर्मकांड जुड़ गए, लेकिन इन्हें नजरअंदाज करके देखें तो लोक जीवन की सादगी और निश्छलता के प्रतीक इस पर्व की भावनात्मक परंपरा सदियों तक संजो कर रखने लायक है।
(लेखक पूर्व आईपीएस अधिकारी हैं)
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UPUKLive: सदियों तक संजो कर रखने लायक है भाई दूज पर्व की भावनात्मक परंपरा
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