बच्चों के लिए क्या लिख रहे हैं हम ?

बच्चों के लिए क्या लिख रहे हैं हम ?

ध्रुव गुप्त 
बच्चों को शाम ढलते ही कहानियाँ सुनाकर उनका मन बहलाने और उन्हें सुलाने की परंपरा संभवतः मानव सभ्यता के इतिहास जितनी ही पुरानी है। नन्हे बच्चों को नींद के लिए माँ की गोद या लोरियाँ ही काफी हैं, लेकिन बढ़ते बच्चों की कल्पनाशीलता को थोड़ा बड़ा आकाश चाहिए। कुछ नया,कुछ अजूबा, कुछ रोमांचक।

उनकी इसी ज़रुरत को पूरा करने के लिए माँ और घर के बड़े-बूढ़ों ने किस्सों-कहानियों का सहारा लिया होगा। इन किस्सों में आरम्भ में उनके व्यक्तिगत और सामाजिक अनुभव शामिल रहे होंगे। समय के साथ धीरे-धीरे उनमें उनकी कल्पनाशीलता भी शामिल होती गई।

बात गाँव के किसानों, साहूकारों और सामंतों से राजा-रानियों तक पहुँची। किस्सों में रोमांच पैदा करने के लिए कालान्तर में इनमें जादूगर, राक्षस, जिन्नात, भूत-प्रेत, देवदूत और परियाँ जुड़ती चली गईं। कहने के शैली में बदलाव आए। किस्सागोई की इस लगातार विकसित होती कला ने न सिर्फ किस्सा कहने वालों की सोच को विस्तार दिया, बल्कि उन्हें सुनने वाले बच्चों की कल्पना-शक्ति को भी पंख और परवाज़ बख्शे। बच्चों में अपनी भाषा और साहित्य के प्रति अभिरुचि पैदा करने की यह सबसे पहली कोशिश भी थी। अंग्रेजी में इन्हें बच्चों की ‘बेडटाइम स्टोरीज’ कहा जाता है। तब से आज तक ये किस्से किशोर होने बच्चों की सोच के अभिन्न अंग और आकर्षण के प्रमुख विषय रहे हैं।

किस्सों के प्रति यह आकर्षण दुनिया भर के बच्चों में कमोबेश एक जैसा ही रहा है। आदिम जनजातियों से लेकर विकसित सभ्यताओं तक। बड़ों में वैज्ञानिक दृष्टि और तर्कशक्ति के विकास तथा बच्चों की बदलती रुचियों के साथ और देश-काल के अनुरूप बेडटाइम स्टोरीज के कथ्य और कहने के तरीकों में थोड़े बदलाव ज़रूर आए हैं, लेकिन इनके प्रमुख पात्र - राजा-रानी, भूत-प्रेत, राक्षस और परियाँ अब भी अपनी जगह से विस्थापित नहीं हुई हैं। किसी भी तर्क से परे इनका जादू आज भी बरक़रार है।

एक दशक पहले अमेरिका के बच्चों के बीच कराए गए एक व्यापक सर्वेक्षण से पता चला कि बचपन की कहानियों के पात्रों में परियाँ बच्चों की सबसे पहली पसंद थीं। स्त्रियों की सी शक्ल-सूरत लेकर किसी दूसरे लोक से आने वाली, अपनी जादुई शक्ति के बल पर पंखों से ऊँची-ऊँची उड़ान भरने वाली, बच्चों का मन बहलाने और उन्हें परीलोक की सैर पर ले जाने वाली असीम सौन्दर्य वाली शर्मीली परियाँ बच्चों की कल्पनाशक्ति को सबसे ज्यादा उड़ान देती रही हैं।

बाल कथाओं के भूत-प्रेत, चुड़ैलें, तांत्रिक और जादूगर बच्चों के दूसरे सबसे बड़े आकर्षण साबित हुए। यह शायद इसीलिए कि इन पात्रों में बच्चों के भीतर ही नहीं, बड़ों में भी डर और रोमांच पैदा करने की क्षमता होती है। बच्चों की तीसरी पसंद सामंती व्यवस्था के अवशेष राजा-रानी, राजकुमार-राजकुमारी और उनके महल पाए गए। हाल के समय में बेडटाइम स्टोरीज में कुछ नए पात्रों का भी प्रवेश हुआ है। दूसरे ग्रहों से आए एलियंस, अंतरिक्ष यात्री, आकाशीय युद्ध, अच्छे-बुरे वैज्ञानिक, दुर्दांत अपराधी और जासूस भी उनमें शामिल हो गए हैं।

पिछले कुछ दशकों में बच्चों की ज़िन्दगी में मोबाइल फोन, टीवी, वीडियो गेम आदि के बढ़ते दखल के साथ महानगरों के बच्चों में मौखिक किस्सों के प्रति आकर्षण बहुत कम हुआ है। अब उन्हें नींद को बुलाने या भगाने के लिए श्रव्य नहीं, दृश्य कहानियाँ चाहिए। गाँवों के बच्चों के बीच वाचिक किस्सागोई का जादू अभी बरकरार है। संकट अब ऐसे किस्से सुनाने वाले लोगों का है। पिछली पीढ़ी तक लगभग हर टोले-मुहल्ले में किस्सागोई की कला में माहिर एक-दो लोग हुआ करते थे। शाम ढलते ही ऐसे लोगों के गिर्द आसपास के बच्चे एकत्र हो जाया करते थे। उत्सुकता और जिज्ञासा का एक अजीब-सा माहौल होता था तब।

किस्सा ख़त्म होते ही भारी आँखों में नींद लिए बच्चे माँ की गोद में लौट जाते थे। टोलों-मुहल्लों से सामूहिकता की संस्कृति लुप्त हुई तो यह ज़िम्मेदारी घर के किसी न किसी सदस्य ने संभाल ली। दादी और नानी के किस्से ऐसे ही नहीं मुहाबरें बने। एकल परिवारों के अकेलेपन, जीवन की जटिलताओं और आपाधापी में शहरों के लोगों के पास न बच्चों को देने के लिए पर्याप्त समय है और न उन्हें कहानियाँ सुनाने का धैर्य। नतीजा यह हुआ है कि बच्चों की मानसिक ज़रूरतें उन्हें टीवी और वीडियो गेम्स की तरफ खींचकर ले गई हैं। टीवी पर आने वाले बच्चों के कार्यक्रमों की कहानियों, उनके अजीबोगरीब चरित्र और कारनामों ने बच्चों की रोमांचप्रियता को कुछ हद तक खुराक तो जरूर दिया हैं, लेकिन यह माध्यम अपने साथ जो कुछ लेकर आया हैं वह वांछित तो क़तई नहीं है। रहस्य और रोमांच की कथाओं का वाचिक परंपरा से दृश्य परंपरा में यह परिवर्तन बच्चों को निरंतर अकेला कर रहा है। उनके भीतर के पारिवारिक और सामूहिकता के संस्कारों का निरंतर क्षरण हो रहा है। यह परिवर्तन कस्बों में भी तेजी से घट रहा है। भारतीय गाँवों के ज्यादातर कृषि पर निर्भर संयुक्त परिवारों में किस्सागोई की यह वाचिक परंपरा अभी जीवित है। शायद यही वजह है गाँव के बच्चे अपनी जड़ों से आज भी कटे नहीं हैं।

माध्यम चाहे जो हो, बच्चो की दिलचस्पी इन काल्पनिक कहानियों में आज तक बनी हुई है। आगे भी बनी रहेगी। समाज में बढ़ती जटिलता, शहरीकरण और संयुक्त परिवारों के टूटने के साथ वाचिक किस्सागोई की आदिम परंपरा को देर-सबेर नष्ट होना ही है। इस तथ्य को समझ कर दुनिया भर के मनोवैज्ञानिक किस्सों की मौखिक परंपरा का विकल्प खोजने के लिए चिंतित हैं। यह माना जा रहा है कि टीवी के सहारे तेजी से फ़ैल रही कथा सुनाने की दृश्य परंपरा बच्चों को समाज से काटकर अकेला कर देने की घातक भूमिका निभा रही है। इससे बच्चे न केवल अपने आसपास की दुनिया में दिलचस्पी खोते जा रहे हैं, बल्कि धीरे-धीरे अवसादग्रस्त भी हो रहे हैं। स्वस्थ विकल्प शायद किताबें ही हैं। यह बच्चों के लिए ज्यादा सुरक्षित माध्यम है। इन दिनों बच्चों के मानसिक और सामुदायिक विकास तथा उनमें कल्पना-शक्ति की उर्वरता में बाल कहानियों की महत्ता को देखते हुए यूरोपीय देशों में किस्सागोई की वाचिक परंपरा न सही, पाठ्य परंपरा को जीवित रखने के प्रयास हो रहे हैं। योजनाबद्ध तरीके से बच्चों के लिए किताबें और कॉमिक्स लिखे और कम कीमत पर लोगों को उपलब्ध कराए जा रहे हैं। (कल भी ज़ारी)
(लेखक पूर्व आईपीएस अधिकारी हैं)
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