एक हजार साल से लगातार !

एक हजार साल से लगातार !

ध्रुव गुप्त 
दादा-दादी, नाना-नानी या बड़े-बुजुर्गों की पाठशाला में परंपरा का पाठ हम सबने सीखा है। उन्होंने अपने पूर्वजों से सीखा होगा। अपने समाज में यह व्यवस्था सदियों से चली आ रही है। कुछ ऐसी ही व्यवस्था पशु-पक्षियों में भी है। शेर अपने बच्चों को शिकार करना सिखाता है। कुछ जानवर अपने बच्चों को शिकारी पशुओं से बचना सिखाते हैं। पक्षी अपने बच्चों को उड़ना और चहकना सिखाते हैं। उनके यहां भी यह व्यवस्था सदियों से चली आ रही है। लेकिन हम इंसानों की परम्पराएं बदलती रहती हैं। समय, स्थान और परिस्थिति के अनुसार उसमें बहुत कुछ जुड़ता है और बहुत कुछ छोड़ भी दिया जाता है। लेकिन पक्षी अपनी परंपरा को नहीं छोड़ते। वैज्ञानिकों ने लंबे अध्ययन के बाद यह निष्कर्ष निकाला है कि गाने वाली चिड़ियों के सुर नहीं बदलते।

दुनिया के सभी प्रजातियों के पक्षियों के पास अपने-अपने गीत हैं। हमारे अपने पैमाने पर कुछ कोमल और कुछ कर्कश। कोमल और मधुर गीत आमतौर पर छोटे पक्षियों के हिस्से में आए हैं। पक्षियों की विभिन्न प्रजातियों के गीतों में प्रकृति के जैसी विविधता भी है, बच्चों के जैसी मासूमियत भी और कभी-कभी हम मनुष्यों की तरह भावनाओं की जटिलता भी। विशेषज्ञों ने गायन की उनकी भंगिमाओं, नोट्स और आरोह-अवरोह का बारीकी से अध्ययन कर हम मनुष्यों की गायन-कला से उनकी गायन-कला की कुछ समानताएं रेखांकित की हैं। गाते तो लगभग सभी पक्षी हैं, लेकिन उनमें से कुछ ही ऐसे हैं जिनके हृदयस्पर्शी गीत हम मनुष्यों की भावनाओं को छूने, सहलाने की क्षमता रखते हैं। दुनिया भर के शोधकर्ताओं ने तमाम पक्षियों के गीतों का अध्ययन करने के बाद कुछ बेहतरीन गायक पक्षियों को खोज निकाला है। सबकी आवाज अलग, गीत अलग, अंदाज अलग, स्वर-लहरियां अलग और प्रभाव अलग। वैसे तो ऐसे पक्षियों की संख्या सौ से ज्यादा है, लेकिन उनमें से दस पक्षी ऐसे हैं जिन्हें प्रकृति के सबसे बेहतरीन गायकों का दर्जा दिया गया है।

ये पक्षी हैं कॉमन या आम नाइटिंगेल, कैनरी, एशियाई कोयल, गुलाबी धारीदार ग्रोसबीक, अमेरिकी रॉबिन, सॉन्ग थ्रश, चैनल-बिल कुक्कू, घरेलू गौरैया,ब्लैक-बिल मैग्पी या अमेरिकी मैग्पी। गायक पक्षियों की दसवीं प्रजाति अमेरिकन स्वंप स्पैरो उपरोक्त सभी गायक पक्षियों से अलग है। इसे लोग सांस्कृतिक पक्षी भी कहते हैं। बाकी पक्षी अपने गीतों में समय-समय पर बदलाव भी करते हैं और दूसरे पक्षियों की नकल भी। अमेरिकन स्वंप स्पैरो गौरैया की वह प्रजाति है जो सुनती तो सबकी है, लेकिन गाती वही है जो उसे अपनी विरासत से हासिल है।

पक्षी वैज्ञानिकों का कहना हैं कि उनके मष्तिष्क का आकार छोटा होता है। इसके बावजूद उन्हें वह धुन याद रहती है। यह किसी की नकल नहीं करती। शोध में पाया गया है कि हजारों साल से भी ज्यादा अवधि से यह प्रजाति एक ही तरह के गीत गाए जा रही है। अपने पूर्वजों के गीतों का अनुसरण करने की उनकी यह सुदीर्घ परंपरा हैरान कर देने वाली है। विरासत से हासिल अपने गीतो में स्वंप स्पैरो कोई बदलाव नहीं करते हैं। कुछ सालों पहले क्वीन मेरी यूनिवर्सिटी, लंदन, इम्पीरियल कॉलेज, लंदन और ड्यूक यूनिवर्सिटी, नार्थ कैरोलिना ने इन पक्षियों के व्यवहारों का लंबे समय तक अध्ययन करने के बाद यह पाया कि बहुत कोशिशों के बाद भी ये पक्षी दूसरों के गीत गाने या पारंपरिक रूप से हासिल अपने गीतों में बदलाव करने को तैयार नहीं हुए। हम मनुष्यों की तरह इन पक्षियों की अपनी सांस्कृतिक परम्पराएं हैं, लेकिन जो चीज इन्हें हम मनुष्यों से अलग करती है वह यह है कि ये हम मनुष्यों की तरह अपनी संस्कृति और सांस्कृतिक परंपराओं का त्याग कर नई चीजों के पीछे नहीं भागते। शोधकर्ताओं ने उत्तर-पूर्वी अमेरिका के कच्छ भूमि में पाई जाने वाली गौरैयों की प्रजातियों का अध्ययन किया। इस प्रजाति की गौरैया चुनिन्दा गानों का चयन करती है। इस तरह सीखने की उनकी रणनीति को 'कांफिर्मिस्त बायस' कहते हैं, जो हम इंसान भी अपनाते हैं। इन पक्षियों में हम मनुष्यों की तरह अपने गीतों की श्रेणियां बनाने और उपयुक्त अवसरों पर उन्हें गाने का सलीका है। इन्हें देखकर अध्येताओं को यह अहसास हुआ कि हमारी सांस्कृतिक परम्पराएं कैसे अचेतन रूप से हमारे जीवन के जटिल व्यवहारों को नियंत्रित करती हैं। शोध से जुड़े क्वींस मैरी स्कूल ऑफ़बायोलॉजिकल एंड केमिकल साइंसेज के डॉ रोबर्ट लैक्लैन कहते हैं, 'हम सभी जानते हैं कि पक्षियों की कुछ प्रजातियां अपनी प्रजातियों के अन्य सदस्यों से ही गाने सीखती हैं। वहीँ इंसानों में, इस तरह की शिक्षा एक ही बोली साझा करने वाले बड़े लोगों से प्राप्त होती हैं। सामान्य रूप से सीखना सांस्कृतिक विकास की प्रक्रियाओं के माध्यम से ही दीर्घकालीन परंपराओं की ओर जाता है। इस शोध से पता चलता है कि पक्षियों का सांस्कृतिक व्यवहार भी मनुष्यों से मेल खा सकता है।'

अपने भोलेपन के अलावा कुछ हद तक हमारे संगीत संस्कारों के निकट होने की वजह से मानव सभ्यता के आरम्भ से ही पक्षी हमारे दिलों के बहुत पास रहे हैं। अनंत काल से हमारी सुबहें इन पक्षियों के संगीतमय कलरव से शुरू और हमारे दिन इनके थके हुए संगीत के साथ ख़त्म होते आए हैं। इनके होने भर से हमारे आसपास के वातावरण में ही नहीं, हमारी संवेदनाओं में भी संगीत बजता है। ये पक्षी जीवन की जटिलताओं के बीच हमारे लिए भोलेपन का एक भरोसा रहे हैं। दुर्भाग्य से बेतरतीब शहरीकरण और अंध औद्योगीकरण के इस पागल दौर में ये पक्षी हमसे रूठते जा रहे हैं। जिस रफ्तार से ये पक्षी हमसे दूरी बना रहे हैं, उसी रफ्तार से हमारे जीवन से भोलापन और संगीत गायब होता जा रहा है। जिन गांवों में अभी कंक्रीट के जंगलों ने पेड़-पौधों की जगह नहीं ली है, वहां जीवन में थोड़ा-बहुत संगीत जरूर बचा हुआ है।

आदिवासी समाजों में मनुष्य और पक्षियों का सनातन रिश्ता अब भी जस का तस क़ायम है। वहां लोग इन पक्षियों की पूजा भी करते हैं और इनसे अपने घर-आंगन और बाग-बगीचों को कलरव से भर देने की याचना भी करते हैं। अफ्रीका के कुछ कबीलों में जबतक घर के छप्पर और सहन में पक्षियों का संगीत नहीं गूंजे, घर में किसी धार्मिक अनुष्ठान की शुरुआत नहीं होती। वहां के कुछ आदिवासी कबीले पक्षियों के गान में अपनी दिवंगत मांओं और दादियों की लोरियां सुनते और महसूस करते हैं। उन लोगों का विश्वास है कि माएं मर तो जाती हैं, लेकिन मरने के बाद भी अपनी संतानों से उनका रिश्ता नहीं टूटता। उनकी पवित्र आत्माएं चिड़ियों का रूप धरकर अपने घरों की खिडकियों और रोशनदानों में या घर के पास के किसी पेड़ पर घोंसला बनाकर अपनी संतानों की निगरानी करती हैं। आवाज लगाकर वे उन्हें किसी आने वाले अनिष्ट से बचाने की कोशिश करती हैं। उनकी चहचहाहट अपनी संतानों के लिए उनका स्नेह है, उनकी तेज-तेज आवाज उनकी हिदायतें और उनका संगीत उनकी लोरियां हैं जिनके पीछे अपने विगत परिवार और अपने बच्चों के लिए उनकी असीम चिंताएं छिपी होती हैं।
(लेखक पूर्व आईपीएस हैं)
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