वीरे दी वेडिंग मतलब पूरी की पूरी फिल्म अश्लीलता और दिमागी दीवालिएपन की कहानी है

वीरे दी वेडिंग मतलब पूरी की पूरी फिल्म अश्लीलता और दिमागी दीवालिएपन की कहानी है

नदीम अख्तर
वीरे दी वेडिंग कैसी फिल्म है ? तो मैं कहूंगा कि ये अपने समय से आगे की फिल्म है. ठीक उसी तरह, जब यश चोपड़ा की श्रीदेवी और अनिल कपूर वाली फिल्म -लम्हे- आई थी तो उसके बारे में लोगों ने कहा था कि ये अपने समय से आगे की फिल्म है. पर दोनों फिल्मों में बहुत बड़ा फर्क है और वह फर्क है बाउंड्री लाइन क्रॉस करने का अंतर. वीरे दी वेडिंग सारी सीमा रेखा लांघ गई.

वीरे दी वेडिंग के निर्देशक शशांक घोष हैं, जिनके बारे में मैं ज्यादा नहीं जानता लेकिन फिल्म देखने के बाद उनको इतना जरूर जाना कि फिल्म हिट कराने के लिए वो कुछ भी करने को तैयार थे. फिल्म में चारों हीरोइन्स अपशब्द और नॉन वेज डायलॉग्स ऐसे बोलती हैं, जैसे उनके हिसाब से इसके बिना आज की -मॉडर्न- लड़कियों का खाना ही नहीं पचता. और डायरेक्टर घोष इन बेहूदा संवादों के मार्फत जो कॉमेडी क्रिएट करना चाहते हैं, वो बेहद फूहड़ लगती है. लगता है कि घोष बाबू ये सोचकर फिल्म बना रहे थे कि वो सत्यकथा पर आधारित फिल्म -फूलन देवी- बना रहे हैं, जिसमें गाली जरूरी है क्योंकि सताई गई डाकू फूलन देवी गाली दिए बिना कैसे बात करेंगी ??!!

इस फिल्म का सबसे दुखद पहलू ये है कि इसमें भारतीय परिवार परम्परा का जमकर माखौल उड़ाया गया है. बंगाली घोष बाबू को ये नहीं मालूम कि आज पूरी दुनिया में जब एकीकृत परिवार बुरी तरह से टूट रहे हैं तो भारत की पुरानी पारिवारिक परम्पराएं ही इस विकासशील देश के सिस्टम से बेहद निराश लोगों को जीने की ताकत देती हैं, उनका सम्बल बनती हैं. मतलब कि मां-बाप फिल्म में मजाक की चीज है. मां-बाप आज के जमाने में लल्लू-पंजू हैं और औलाद की नजर में उनकी कोई कीमत नहीं. बंगाली घोष ने दिखाया है कि अल्ट्रा मॉडर्न लड़कियों की सोच से बेचारे बुजुर्ग मां-बाप तालमेल बिठाने के लायक ही नहीं हैं. उन्हें कचरे में फेंक देना चाहिए. बाकी शादी के बारे में बंगाली घोष डायरेक्टर एक लड़की के मुंह से ये डायलॉग बुलवाता है कि बिना ट्राई किए तो वह कार भी नहीं खरीदती, पति कैसे चुन लेगी ? ट्राई मतलब सेक्स. समझे !!

ऐसा लगता है कि पूरी फिल्म सेक्स के इर्द-गिर्द ही घूम रही है. बंगाली डायरेक्टर घोष मानसिक दीवालियापन की सीमा इस हद तक लांघ जाते हैं कि लगता है कि इन अल्ट्रा मॉडर्न लड़कियों की जिंदगी में सिर्फ एक ही चीज बची है और वो है- सेक्स. लेकिन ऐसा करके डायरेक्टर ने महिलाओं का अपमान ही किया है और उन्हें फिल्म में उपभोग की वस्तु बना डाला है. यानी लड़की मतलब सेक्स. और इससे इन लड़कियों को भी कोई गुरेज नहीं क्योंकि वे बिना बात के नॉनवेज डायलॉग पूरी फिल्म में बोलती रहती हैं. जैसे फलां बाबू इसकी ले लो, वगैरह-वगैरह. कम लिख रहा हूं, ज्यादा समझिएगा.

जिस बॉलीवुड में प्रेम और परिवार को इस रूप में दिखाया जाता रहा हो कि गाना ही लिख दिया- फूल तुम्हें भेजा है खत में, फूल नहीं मेरा दिल है....यानी प्यार का इजहार करने में भी एक क्लास है, एक अदा है, एक शर्म है, एक नफासत है, एक रुहानी एहसास है, एक दिलों का रिश्ता है, एक जज्बातों की महक है, वहां वीरे दी वेडिंग में बंगाली डायरेक्टर करीना कपूर को ये बोलते हुए दिखाता है कि इतने साल से Live in में रह रहे हैं तो शादी करने की क्या जरूरत है ? दूसरी हीरोइन का हाल ये है कि एक रात अचानक मिला लड़का उसके हीरोइन के अंडरवियर संभाल के रख लेता है और बाद में उसे दिखाकर हीरोइन को चिढ़ाता है. गजब फास्ट हो बे बंगाली डायरेक्टर ! बेटा इतनी तेजी तो अमरीका वाले भी नहीं दिखाते !!!

बॉलीवुड की ये परम्परा रही है कि वह अपनी फिल्मों के जरिए समाज में आ रही बुराइयों पर चोट करता है और एक आइडियल कहानी के माध्यम से उस जड़ की ओर लौटने को प्रोत्साहित करता है, जो भारत की पहचान रही है. यानी फिल्मों में सामाजिक संदेश रहता है. चाहे वो राजकपूर की फिल्म -जिस देश में गंगा बहती हो- रही हो या -प्रेमरोग- जैसी फिल्म हो. या फिर मां-बाप और परिवार की अहमियत को एक बार फिर रोशन करने वाली करन जौहर की फिल्म -कभी खुशी, कभी गम- रही हो या सूरज बड़जात्या की फिल्म -हम आपके हैं कौन- हो या फिर -मैंने प्यार किया- हो या अभी हाल ही में आई -प्रेम रतन धन पायो- हो. और फिर अमिताभ बच्चन वाली फिल्म -सूर्यवंशम- को याद कर लीजिए या फिर उनकी ही एक और फिल्म -बागबां- को देख लीजिए, जिसमें मां-बाप, भाई-बहन और परिवार के मायने बताए गए हैं. नई पीढ़ी को ये संदेश दिया गया है कि दुनिया में अगर आपके पास कोई धन है, तो वह आपका परिवार ही है. बाकी सब तो मिट्टी है.

पर वीरेदी वेडिंग वाले बंगाली डायरेक्टर घोष को ये बात समझ नहीं आई. फेमिनिज्म और नारी आजादी के नाम पर उसने गाली-गलौज और नॉन वेज कॉमेडी से बुनी एक ऐसी फिल्म बना दी, जिसमें बेटे की शादी 1.5 करोड़ मे करने वाला बाप किसी मसखरा सा लगता है. लड़के की मां इस दुनिया की सबसे बड़ी चिरकुट बकलोल है और फेमिनिज्म का झंडा बुलंद किए हुए नई-नवेली बहू करीना कपूर अल्ट्रा स्मार्ट और मॉडर्न समझदार लड़की. इतनी ज्यादा समझदार और -गुणी- कि शादी में रिश्तेदारों के प्यार से वो पकने लगती है. उसे लौंडे के अलावा मतलब अपने पति के अलावा परिवार में किसी से मतलब नहीं. सब कूड़े के ढेर हैं यानी लड़की शादी सिर्फ लड़के से कर रही है और सास-ससुर समेत लड़के की पूरी फैमिली उसके लिए nightmare है, एक बुरा सपना है. वह इसे झेल नहीं सकती और शादी बीच में ही छोड़कर भाग खड़ी होती है. फिर जब लड़का ढूंढता हुआ उसके पास पहुंचता है और मनता है कि राजकुमारी जी ! काहे चली आई शादी के बीच से तो फिर अल्ट्रा मॉडर्न लड़की कहती है कि तेरे परिवार को हैंडल करना और इन रिश्तों को हैंडल करना मेरे वश का नहीं. या तो अपने परिवार को चुन ले या फिर मुझे चुन ले. अब कोई भी समझदार लड़का क्या करेगा ? अपने परिवार को चुनेगा ना और चाहेगा कि उसकी पत्नी भी उसके परिवार का हिस्सा बने. सो लड़का चला जाता है और करीना उससे रिश्ता तोड़ देती है कि डियर. फैमिली मुझसे हैंडल नहीं होगी.

ये सब देखकर मेरा खून इतना खौला कि लगा कि बंगाली डायरेक्टर घोष के कान के नीचे एक बजाऊं और पूछूं कि बेटा ! तूने शादी की है ना ! तो बीवी के लिए अपने मां-बाप को Old Age Home मे भेजा है कि नहीं ??!! और अगर नहीं भेजा है तो फिल्म में हीरोइन के इस कुतर्क और घटिया सोच को Glorify क्यों कर रहा है बे ??!!

एक बात और समझ नहीं आई. फिल्म में स्वरा भास्कर को सेक्स की इच्छापूर्ति के लिए यौन यंत्रों का इस्तेमाल करते दिखाया गया है. और फिर उस पे तुर्रा ये कि उसका पति इस बात को लेकर उसे ब्लैकमेल करता है. और फिर बंगाली डायरेक्टर घोष ने मानसिक दीवालियापन की हद उस वक्त पार कर दी, जब वह फिल्म में दिखाता है कि स्वरा भास्कर अपने मां-बाप से ये कहती है कि पति के साथ सेक्स नहीं होने के कारण वह सेक्स इंस्ट्रूमेंट का इस्तेमाल करती थी. और इसके बाद उसका निर्लज्ज बाप बहुत जोर-जोर से हंसता है कि अरे बेटी ! बस इतनी सी बात ! मुझे पहले बता देती. हा हा हा... मतलब साला भारत में कौन बेटी अपने बाप से कहती होगी कि पापा, मैं सेक्स की इच्छापूर्ति के लिए कृत्रिम यंत्रों का इस्तेमाल करती हूं और उसका बाप इसे हुल्के-फुल्के अंदाज में लेकर हंसेगा !! अबे अगर कहेगी भी तो मां से बोल देगी (हमारे देश में अभी भी इतनी शर्म बची है कि लड़कियां मां को भी नहीं बताएंगी), बाप से क्यों बोलेगी बे ??!!

मतलब पूरी की पूरी फिल्म अश्लीलता और दिमागी दीवालिएपन की कहानी है. लेकिन चालाक डायरेक्टर बंगाली घोष फिर फिल्म में गेम करता है और पूरी कहानी को आखिर में नाटकीय अंदाज में बदलने की कोशिश करता है. अचानक से अल्ट्रा मॉडर्न लड़कियों की आधुनिकता खत्म हो जाती है और परिवार उनके लिए महत्वपूर्ण हो जाता है और मां-बाप के आशीर्वाद से फिल्म की हैप्पी एंडिग हो जाती है. मतलब बंगाली डायरेक्टर को खुद ही पता नहीं है कि उसकी फिल्म की लाइन क्या है. आधुनिक सोच जो अमरीका जैसे देशों में भी नहीं है या शायद मंगल ग्रह पर है या भारत की पारिवारिक संस्कृति जिसने यहां के समाज को मजबूती से बांधे रखा है. तमाम झंझावातों के बावजूद.

कुल मिलाकर वीरे दी वेडिंग एक फूहड़ और भौंडा ड्रामा है और कहानीकार व निर्देशक के मानसिक दीवालिएपन का सक्रीन पर अश्लील चित्रण. फिर भी ये फिल्म एक बार देखी जानी चाहिए. सबको देखना चाहिए. खासकर लड़कियों को, जिनको पता चलेगा कि अल्ट्रा मॉडर्न गर्ल्स भारत की हकीकत नहीं हैं. इस देश की हकीकत वे लड़कियां हैं, जो रोज गर्मी में 5 किमी पैदल चलकर पानी लाती हैं. फिल्म में दिखाई गई हाई सोसायटी यान एलीट गर्ल्स हकीकत नहीं है, हकीकत एक मध्यमवर्गीय परिवार की वह लड़की है, जो घर का सारा काम भी करती है, घर भी संभालती है, घर वालों पर प्यार भी लुटाती है और पढ़ाई करके परीक्षा में अव्वल भी आती है.

यानी फिल्म में जिन अल्ट्रा मॉडर्न हाई-फाई चार लड़कियों को दिखाया गया है, वो भारत जैसे देश में नहीं रहती हैं. हां, वे मंगल ग्रह पे जरूर मिल जाएंगी. और अगर एलीट क्लास में ऐसी इक्का-दुग्गा लड़कियां हों भी, तो कम से कम उन पर फिल्म बनाकर जनसंचार के इतने बड़े माध्यम का दुरुपयोग नहीं करना चाहिए, जिससे समाज पर गलत असर पड़े. गाली देना, नॉन वेज डायलॉग बोलना, सेक्स यंत्रों का इस्तेमाल करना, मां-बाप का मजाक उड़ाना और Live in में रहना मॉडर्न या आधुनिक होनी की निशानी नहीं है और ना ही भारत का समाज ऐसा है, अगर ये बात कोई बंगाली डायरेक्टर घोष को एक-दो नॉनवेज डायलॉग बोलकर बता दे तो मुझ पे बड़ी मेहरबानी होगी.
(ये लेखक के निजी विचार हैं)
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