इस्लाम में वसीयत का कानून

इस्लाम में वसीयत का कानून

मौलाना मोहम्मद नजीब कासमी संभली

वसीयत  क्या हैः- वसीयत उस काम को कहते हैं जिसपर अमल करने का हुक्म मौत के बाद हो। यानी उस काम पर अमल जिंदगी में नहीं बल्कि मौत के बाद हो। मसलन अगर कोई शख्स इंतकाल के वक्त यह कहे कि मेरे मरने के बाद मेरी जायदाद मे से इतना माल या इतनी जमीन फलां शख्स या फलां दीनी इदारा या मुसाफिर खाना या यतीम खाना को दे दिया जाए तो यह वसीयत कहलाती है। 

वसीयत को दो गवाहों की मौजूदगी में तहरीर करना चाहिए ताकि बाद में कोई इख्तेलाफ पैदा न हो। शरीअते इस्लामिया में वसीयत का कानून बनाया गया है ताकि कानूने मीरास की रू से जिन अजीजों को मीरास में हिस्सा नहीं पहुंच रहा है और वह मदद के मुस्तहक हैं मसलन कोई यतीम पोता या पोती मौजूद है या किसी बेटे की बेवा मुसीबत जदा है या कोई भाई या बहन या कोई दूसरा अजीज सहारे का मोहताज है तो वसीयत के जरिए उस शख्स की मदद की जाए। वसीयत करना और न करना दोनों अगरचे जायज हैं लेकिन बाज अवकात मंे वसीयत करना अफजल व बेहतर है। 

एक तिहाई जायजाद में वसीयत का नाफिज करना वारिसों पर वाजिब है यानी मसलन अगर किसी शख्स के कफन दफन के अखराजात दीगर वाजिबी हुकूक और कर्ज की अदाएगी के बाद नौ लाख रूपए की जायदाद बचती है तो तीन लाख तक वसीयत नाफिज करना वारिसैन के लिए जरूरी है। एक तिहाई से ज्यादा वसीयत नाफिज करने और न करने में वारिसैन को अख्तियार है। किसी वारिस या तमाम वारिसैन को महरूम करने के लिए अगर कोई शख्स वसीयत करे तो यह गुनाह कबीरा है जैसा कि नबी करीम (सल0) ने इरशाद फरमाया- जिस शख्स ने वारिस को मीरास से महरूम किया अल्लाह तआला कयामत के दिन उसको जन्नत से महरूम रखेगा (कुछ अर्से के लिए)। (इब्ने माजा, बेहकी) इंतकाल के बाद तर्के (जायदाद या रकम) की तकसीम सिर्फ और सिर्फ विरासत के कानून के एतबार से होगी।
इस्लाम के आगाज में जब तक मीरास के हिस्से मुकर्रर नहीं हुए थे हर शख्स पर लाजिम था कि अपने वारिसों के हिस्से बजरिया वसीयत मुकर्रर करे ताकि उसके मरने के बाद न तो खानदान मंे झगड़ें हों और न किसी हकदार का हक मारा जाए। लेकिन जब बाद में तकसीमे विरासत के लिए अल्लाह तआला ने खुद उसूल व जवाबित बना दिए जिन का जिक्र सूरा निसा में है तो फिर वसीयत का वजूब खत्म हो गया। 

अलबत्ता दो बुनियादी शरायत के साथ इसका इस्तहबाब बाकी रहा। नम्बर एक, जो शख्स विरासत में मुतअय्यन हिस्सा पा रहा है उसके लिए वसीयत नहीं की जा सकती है जैसा मसलन मां, बाप, बीवी, शौहर और औलाद। जैसा कि नबी करीम (सल0) ने हजतुलविदा के मौके पर तकरीबन डेढ लाख सहाबा के मजमे के सामने इरशाद फरमाया- अल्लाह तआला ने हर वारिस का हिस्सा मुकर्रर कर दिया है लिहाजा अब किसी वारिस के लिए वसीयत करना जायज नहीं है। (तिरमिजी शरीफ) 

हजरत अब्दुल्लाह बिन अब्बास (रजि0) की हदीस मे मजीद वजाहत मौजूद है कि मीरास ने उन लोगों की वसीयत को मंसूख कर दिया जिनका मीरास में हिस्सा मुकर्रर है दूसरे रिश्तेदार जिनका मीरास में हिस्सा नहीं है उनके लिए हुक्मे वसीयत अब भी बाकी है। नम्बर दो, वसीयत का निफाज ज्यादा से ज्यादा तर्के के एक तिहाई हिस्से पर हो। और तमाम विर्सा पूरी वसीयत के निफाज पर राजी हों।
[next]
उम्मते मुस्लेमा का इजमाअ है कि जिन रिश्तेदारों का मीरास में कोई हिस्सा मुकर्रर नहीं है अब उनके लिए भी वसीयत करना फर्ज व लाजिम नहीं है क्योंकि फर्जीयत वसीयत का हुक्म मंसूख हो गया है यानी बशर्ते जरूरत वसीयत करना मुस्तहब है।
वसीयत की मशरूइयत कुरआन सेः- नम्बर एक, अल्लाह तआला इरशाद फरमाता है- तुम पर फर्ज किया गया है कि अगर तुम में से कोई अपने पीछे माल छोड़ कर जाने वाला हो तो जब उसकी मौत का वक्त करीब आ जाए वह अपने वाल्दैन और करीबी रिश्तेदारों के हक में दस्तूर के मुताबिक वसीयत करे। यह मुत्तकी लोगों के जिम्मे एक लाजिमी हक है। फिर जो शख्स इस वसीयत को सुनने के बाद उसमें कोई तब्दीली करेगा तो उसका गुनाह उन लोगों पर होगा जो उसमें तब्दीली करंेगे। यकीन रखो कि अल्लाह (सबकुछ) सुनता और जानता है। हां अगर किसी शख्स को यह अंदेशा हो कि कोई वसीयत करने वाला बेजा तरफदारी या गुनाह का इंर्तिकाब कर रहा है और वह मुताल्लिका आदमियों के बीच सुलह करा दे तो उसपर कोई गुनाह नहीं। बेशक अल्लाह बहुत बख्शने वाला बड़ा मेहरबान है। (सूरा बकरा 180.182) वसीयत का लाजिम और फर्ज होना यह हुक्म उस जमाने में दिया गया था जबकि विरासत के एहकाम नाजिल नहीं हुए थे। अल्लाह तआला ने वसीयत का हुक्म बतदरीज नाजिल फरमाया। गरजकि मजकूरा बाला आयत में वसीयत की फर्जियत का हुक्म मंसूख हो गया है अलबत्ता इस्तहबाब बाकी है। 
[next]

नम्बर दो, अल्लाह तआला ने सूरा निसा में जहां वारिसों के मुतअय्यन हिस्से का जिक्र फरमाए हैं कई बार इस कानून को जिक्र फरमाया- यह सारी तकसीम उस वसीयत पर अमल करने के बाद होगी जो मरने वाले ने की है या अगर उसके जिम्मे कोई कर्ज है तो उसकी अदाएगी के बाद। सूरा निसा में कई बार वसीयत के जिक्र से मशरूइयत रोजे रौशन की तरह वाजेह है। नम्बर तीन, अल्लाह तआला इरशाद फरमाता है- ऐ ईमान वालो! जब तुम मे से कोई मरने के करीब हो तो वसीयत करते वक्त आपस के मामलात तय करने के लिए गवाह बनाने का तरीका यह है कि तुम में से दो दयानतदार आदमी हों (जो तुम्हारी वसीयत के गवाह बनें) या अगर तुम जमीन में सफर कर रहे हो और वहीं तुम्हें मौत की मुसीबत पेश आजाए तो गैरों (यानी गैर मुस्लिमों) मंे से दो शख्स हो जाएं। (सूरा मायदा-106) इस आयत में अल्लाह तआला ने इरशाद फरमाता है कि हिज्र के साथ सफर में भी वसीयत की जा सकती है और वसीयत करते वक्त दो अमानतदार शख्स को गवाह भी बना लिया करो ताकि बाद में किसी तरह का कोई इख्तिलाफ पैदा न हो।
[next]
वसीयत की मशरूइयत हदीसे नबवी सेः- हजरत अब्दुल्लाह बिन उमर (रजि0) से रिवायत है कि नबी करीम (सल0) ने इरशाद फरमाया- किसी मुसलमान के लिए जिसके पास वसीयत के काबिल कोई चीज हो दुरूस्त नहीं कि दो रात भी वसीयत को लिखकर अपने पास महफूज किए बगैर गुजार दे। (सही बुखारी)
कुरआन व हदीस की रौशनी मे उलेमा ने कहा है कि इससे मुराद ऐसा शख्स है जिस के जिम्मे कर्ज हो या उसके पास किसी की अमानत रखी हो या उसके जिम्मे कोई वाजिब हो जिसे वह खुद अदा करने पर कादिर न हो तो उसके लिए वसीयत मंेे यह तफसील लिखकर रखना जरूरी है आम आदमी के लिए वसीयत लिखना जरूरी नहीं है बल्कि मुस्तहब है।
[next]
वसीयत की मशरूइयत  इज्माअ उम्मत सेः- कुरआन व हदीस की रौशनी में पूरी उम्मते मुस्लेमा का वसीयत के जवाज पर इज्माअ है। जैसा कि अल्लामा इब्ने कदामा ने अपने मशहूर किताब  अल मगनी मंे वसीयत के जवाज पर इजमाअ उम्मत का जिक्र किया है।
वसीयत की हिकमतेंः- वसीयत की कई हिकमतो में से एक हिकमत यह भी है कि इसंान के इंतकाल के बाद विरासत कराबत की बुनियाद पर तकसीम होती है न कि जरूरत के पेशे नजर। यानी जो मैइयत से जितना ज्यादा करीब होगा उसको ज्यादा हिस्सा मिलेगा चाहे दूसरे रिश्तेदार ज्यादा गरीब ही क्यों न हों। लेकिन शरीअते इस्लामिया ने इंसान को यह तरगीब दी है कि अगर कोई शख्स अपने रिश्तेदारों मे से किसी को मदद का ज्यादा मुस्तहक समझता है और उसको मीरास में हिस्सा नहीं मिल रहा है उसके लिए अपने एक तिहाई माल तक वसीयत कर जाए। मसलन किसी शख्स के किसी बेटे का इंतकाल हो गया है और पोता पोती जिंदा हैं तो इसंान को चाहिए कि वह अपनी जायदाद मंे से एक तिहाई माल तक अपने यतीम पोते पोती को वसीयत कर जाए। अल्लाह तआला ने सूरा निसा में इसकी तरगीब भी दी है।
वसीयत की किस्मेंः-वाजिब वसीयत-अगर किसी शख्स का कर्जा है तो उसकी वसीयत करना वाजिब है। अगर जिंदगी में हज फर्ज की अदाएगी नहीं कर सका तो उसकी वसीयत करना वाजिब है। अगर जकात फर्ज थी अदा नहीं की तो उसकी वसीयत करना वाजिब है। अगर रोजे नहीं रख सका उसके बदले में सदका अदा करने की वसीयत  करना वाजिब है। अगर कोई करीबी रिश्तेदार वसीयत के कानून के मुताबिक मीरास में हिस्सा नहीं हासिल कर पा रहा है मसलन यतीम पोते पोती और उन्हें शदीद जरूरत भी है तो वसीयत करना वाजिब तो नहीं है लेकिन उसे अपने पोते और पोती का जरूर ख्याल रखना चाहिए। बाज उलेमा ने ऐसी सूरत में वसीयत करने को वाजिब भी कहा है।
[next]
मकरूह वसीयत- हजरत साद बिन अबी वकास (रजि0) फरमाते हैं कि नबी करीम (सल0) मेरी अयादत के लिए तशरीफ लाए मैं उस वक्त मक्का में था (हजतुल विदा या फतेह मक्का के मौके पर)। नबी करीम (सल0) उस सरजमीन पर मौत को पसंद नहीं फरमाते थे जहां से कोई हिजरत कर चुका हो। नबी करीम (सल0) ने फरमाया कि अल्लाह तआला इब्ने अफरा (साद) पर रहम फरमाए। मैने अर्ज किया या रसूल (सल0)! क्या मैं अपने सारे माल व दौलत की वसीयत (अल्लाह के रास्ते में) कर दूं? आप (सल0) ने फरमाया- नहीं। मैंने पूछा फिर आधे की कर दूं? आप (सल0) ने इसपर भी फरमाया- नहीं। मैने पूछा कि फिर तिहाई माल की कर दूं? आप (सल0) ने फरमाया कि तिहाई माल की कर सकते हो और यह भी बहुत है। अगर तुम अपने रिश्तेदारों को अपने पीछे मालदार छोड़ो तो यह उससे बेहतर है कि उन्हें मोहताज छोड़ दो कि लोगों के सामने  हाथ फैलाते फिरें। इसमें कोई शुब्हा न रखो कि जब भी तुम कोई चीज जायज तरीके पर खर्च  करोगे तो वह सदका होगा। वह लुकमा भी जो तुम उठाकर अपनी बीवी के मुंह में दोगे (वह भी सदका है) और (अभी वसीयत करने की कोई जरूरत भी नहीं) मुमकिन है कि अल्लाह तआला तुम्हें शिफा दे और उसके बाद तुम से बहुत से लोगों को फायदा हो और दूसरे  बहुत से लोग (इस्लाम के मुखालिफ) नुक्सान उठाएं। (बुखारी शरीफ, तिरमिजी शरीफ) गरज कि अगर औलाद व दीगर वारिसैन माल व जायदाद के ज्यादा मुस्तहक हैं तो फिर दूसरे हजरात और इदारों के लिए वसीयत करना मकरूह है।
वजाहतः- नबी करीम (सल0) की शिफा की दुआ के बाद हजरत साद बिन अबी वकास (रजि0) तकरीबन पचास साल तक जिंदा रहे और उन्होंने अजीमुश्शान  कारनामे अंजाम दिए। हजरत साद बिन अबी वकास (रजि0) ने ही सत्रह हिजरी में कूफा शहर बसाया था जो बाद में इल्म व अमल का गहवारा बना। आप ही की कयादत मंे ईरान जैसे सुपर पावर को फतेह किया गया। आपने ही दरिया दजला मंे अपने घोड़े डाल दिए थे। अल्लामा इकबाल ने क्या खूब कहा है- दश्त तो दश्त हैं दरिया भी न छोड़े हमने बहरे जुल्मात में दौड़ा दिए घोड़े हमने।
[next]
नाजायज वसीयतः- एक तिहाई से ज्यादा जायदाद की वसीयत करना, वारिस के लिए वसीयत करना, इस नौइयत की वसीयत नाफिज नहीं होगी। औलाद या किसी दूसरे वारिस को अपनी जायदाद से महरूम करने के लिए किसी दूसरे शख्स या दीनी इदारा को वसीयत करना। हजरत अबू हुरैरा (रजि0) से रिवायत है कि नबी करीम (सल0) ने इरशाद फरमाया- कई लोग (ऐसे भी हैंजो) साठ साल तक अल्लाह की इताअत व फरमांबरदारी में जिंदगी गुजारते हैं फिर जब मौत का वक्त आता है तो वसीयत मंे वारिसों को नुक्सान पहंुचा देते हैं। जिसकी वजह से उनपर जहन्नुम वाजिब हो जाती है। फिर हजरत अबू हुरैरा (रजि0) ने यह आयत (सूरा निसा-12) पढी। जो वसीयत की गई हो उसपर अमल करने के बाद और मरने वाले के जिम्मे जो कर्ज हो उसकी अदाएगी के बाद बशर्ते कि (वसीयत और कर्ज के इकरार करने से) उसने किसी को नुक्सान न पहंुचाया हो। यह सब कुछ अल्लाह का हुक्म है और अल्लाह हर बात का इल्म रखने वाला है। (तिरमिजी)
वसीयत से मुताल्लिक चंद मसायलः- 1. कोई भी शख्स अपनी सेहतमंद जिंदगी में किसी भी औलाद की तालीम उसके मकान की तामीर वगैरह पर कम या ज्यादा रकम खर्च कर सकता है। इसी तरह आम सेहतमंद जिंदगी में औलाद के बीच जायदाद की तकसीम कुछ कम या ज्यादा के साथ कर सकता है। लेकिन उसको चाहिए कि हर मुमकिन औलाद के खर्च और जायदाद को देने में बराबरी करे। आम सेहतमंद जिंदगी में  वसीयत या विरासत का कानून नाफिज नहीं होता। आम सेहतमंद जिंदगी मंे औलाद व दीगर रिश्तेदारों को दी जाने वाली रकम या जायदाद हुब्बा कहलाती है। गरजकि आम सेहतमंद जिंदगी मंे बाप अपनी औलाद मे से अगर किसी को माली एतबार से कमजोर महसूस कर रहा है  या अपने यतीम पोता पोती को अपनी तरफ से मखसूस रकम या जायदाद का कुछ हिस्सा देना चाहता है तो दे सकता है। 2. हजरत जवेरिया बिन्त हारिस (रजि0) के भाई हजरत  अम्र बिन हारिस (रजि0) फरमाते हैं कि नबी करीम (सल0)ने अपनी वफात के वक्त सिवाए अपने सफेद खच्चर, अपने हथियार और अपनी जमीन के जिसे आपने सदका कर दिया था न कोई दरहम छोड़ा था न दीनार, न गुलाम न बांदी और न कोई चीज। (बुखारी शरीफ)गरज कि आपने कोई तर्का नहीं छोड़ा था। इसी वजह से तर्के के ताल्लुक से आपकी कोई वसीयत मौजूद नहीं है। 3. कर्ज को वसीयत पर मुकद्दम किया जाएगा। हजरत अली (रजि0) फरमाते हैं कि नबी करीम (सल0) ने कर्ज वसीयत से पहले अदा करने का हुक्म दिया है। (यानी इंसान के तर्के में से सबसे पहले कर्ज की अदाएगी की जाएगी फिर वसीयत नाफिज होगी) जबकि तुम लोग कुरआन में वसीयत को पहले और कर्ज को बाद में पढते हो। (तिरमिजी) मजकूरा बाला व दीगर अहादीस की रौशनी में पूरी उम्मते मुस्लेमा का इत्तेफाक है कि कर्ज की अदाएगी वसीयत पर मुकद्दम है। 4. शरअन वारिस को वसीयत नहीं की जा सकती है। लेकिन अगर किसी शख्स ने वारिसैन मे से किसी वारिस को वसीयत कर दी और तमाम विर्सा मैइयत के इंतकाल के बाद उसकी वसीयत पर अमल करने की इजाजत दे रहे हैं तो वह वसीयत नाफिज हो जाएगी। इसी तरह अगर किसी शख्स ने एक तिहाई से ज्यादा माल की वसीयत कर दी और तमाम विर्सा मैइयत के इंतकाल के बाद उसकी वसीयत पर अमल करने की इजाजत दे रहे हैं तो वह वसीयत नाफिज हो जाएगी। 5. तहरीर कर्दा वसीयत नामा में तब्दीली भी की जा सकती है यानी अगर किसी शख्स ने कोई वसीयत तहरीर करके अपने पास रख ली फिर अपनी  जिंदगी मंे ही उसमें तब्दीली करना चाहे तो कर सकता है।
एक अहम नुक्ताः- जिस तरह हर शख्स चाहता है कि उसके इंतकाल के बाद उसका माल व जायदाद सही तरीके से औलाद व दीगर वारिसैन तक पहुंच जाए और औलाद उसके माल व जायदाद का सही तरीके से इस्तेमाल करके उसमें मजीद इजाफा करे। इसी तरह हमें इस बात की भी फिक्र व कोशिश करनी चाहिए कि हमारे मरने के बाद हमारी औलाद कैसे अल्लाह के एहकाम व नबी करीम (सल0) के तरीके के मुताबिक जिंदगी गुजारे ताकि वह मरने के बाद हमेशा हमेशा वाली जिंदगी में कामयाब हो सकें। जैसा कि अल्लाह तआला ने अपने पाक कलाम में हजरत इब्राहीम (अलै0) और हजरत याकूब (अलै0) की औलाद के लिए उनकी वसीयत का जिक्र फरमाया है और इसी बात की इब्राहीम ने अपने बेटों को वसीयत की और याकूब ने भी (अपने बेटों को) कि ऐ मेरे बेटो! अल्लाह ने यह दीन तुम्हारे लिए मुंतखब फरमा लिया है। लिहाजा तुम्हें मौत भी आए तो इस हालत में  आए कि तुम मुस्लिम हो। क्या उस वक्त तुम खुद मौजूद थे जब याकूब की मौत का वक्त आया था।  जब उन्होंने अपने बेटों से कहा था कि तुम मेरे बाद किस की इबादत करोगे? उनसब ने कहा था कि हम उसी एक खुदा की इबादत करेंगे जो आप का माबूद है और आपके बाप व दादा इब्राहीम, इस्माईल और इस्हाक का माबूद है। और हम सिर्फ उसी के फरमांबरदार हैं। (सूरा बकरा 132.133)
दूसरा अहम नुक्ताः- जैसा कि हम अपनी जिंदगी के तजुर्बात से अच्छी तरह जानते हैं कि हर शख्स अपनी जिदंगी के आखिरी वक्त में बहुत अहम और जरूरी बात ही करता है। आपके दामाद और चचा जाद भाई हजरत अली (रजि0) से रिवायत है कि नबी करीम (सल0) की जबान से  निकला आखिरी कलाम (नमाज, नमाज और गुलामों के बारे में अल्लाह से डरो) था। (अबू दाऊद, अहमद) हजरत  उम्मे सलमा (रजि0) फरमाती हैं कि नबी करीम (सल0) ने आखिरी वसीयत यह इरशाद फरमाई- नमाज, नमाज। अपने गुलामों (और मातहत लोगों) के बारे में अल्लाह तआला से डरो यानी उनके हुकूक अदा करो। जिस वक्त आपने यह वसीयत फरमाई आप की जबान से पूरे लफ्ज नहीं निकल रहे थे। (अहमद) इससे हम नमाज की अहमियत व ताकीद का अंदाजा लगा सकते हैं कि नबी करीम (सल0) ने आखिरी वसीयत नमाज की पाबंदी के मुताल्लिक की लिहाजा हमें पूरी जिंदगी नमाज का एहतेमाम करना चाहिए। बशुक्रिया - जदीद मरकज़
loading...
loading...
Name

Agra Ajab Gajab Aligarh Amethi Amroha Article Ayodhya Bareilly Bigg Boss 11 Bihar Bijnor Bulandshaher Business Choti Katwa Crime Dehradun Desh Videsh Earthquake Education Eid Entertainment Etah Exam Result Exclusive Faizabad Gadgets Ghaziabad Gorakhpur GST Haldwani Haridwar Independence Day International Itawa Jaspur Jaunpur Job Alert Jokes Kanpur Kanth Kasganj Kashipur Kaushambi Koshambi Lifestyle Lucknow Madhya Pradesh Maharajganj Mathura Media Meerut Moradabad Moradabad City Nainital New Delhi New Year 2017 New Year 2018 News Impact Nikay Chunav Noida Panchayat Chunav Photo Live Pilibhit Politics Raksha Bandhan Ramadan Rampur Religious Saharanpur Sambhal Shahjahanpur Shayri Shravasti Sports Sultanpur Thakurdwara Triple Talaq UKElection2017 UPElection2017 US Nagar Uttar Pradesh Uttrakhand Viral Video Yoga Day Yuva
false
ltr
item
UP UK Live: इस्लाम में वसीयत का कानून
इस्लाम में वसीयत का कानून
इस्लाम में वसीयत का कानून
https://1.bp.blogspot.com/-EazVHwjp19U/V6tH5edWwGI/AAAAAAAAumA/R4Lx1pNvFqsyKb0hzTau_Ob7KpgpvbLRgCK4B/s640/vasiyat.jpg
https://1.bp.blogspot.com/-EazVHwjp19U/V6tH5edWwGI/AAAAAAAAumA/R4Lx1pNvFqsyKb0hzTau_Ob7KpgpvbLRgCK4B/s72-c/vasiyat.jpg
UP UK Live
http://www.upuklive.com/2018/01/vasiyat-in-islam.html
http://www.upuklive.com/
http://www.upuklive.com/
http://www.upuklive.com/2018/01/vasiyat-in-islam.html
true
4409257454490627827
UTF-8
Not found any posts VIEW ALL Readmore Reply Cancel reply Delete By Home PAGES POSTS View All RECOMMENDED FOR YOU LABEL ARCHIVE SEARCH ALL POSTS Not found any post match with your request Back Home Sunday Monday Tuesday Wednesday Thursday Friday Saturday Sun Mon Tue Wed Thu Fri Sat January February March April May June July August September October November December Jan Feb Mar Apr May Jun Jul Aug Sep Oct Nov Dec just now 1 minute ago $$1$$ minutes ago 1 hour ago $$1$$ hours ago Yesterday $$1$$ days ago $$1$$ weeks ago more than 5 weeks ago Followers Follow THIS CONTENT IS PREMIUM Please share to unlock Copy All Code Select All Code All codes were copied to your clipboard Can not copy the codes / texts, please press [CTRL]+[C] (or CMD+C with Mac) to copy