तीस्ता और उनके पति पर फिर एनजीओ की राशि का शराब सेवन व दुरूपयोग करने का लगा आरोप

तीस्ता और उनके पति पर फिर एनजीओ की राशि का शराब सेवन व दुरूपयोग करने का लगा आरोप

संजय रोकड़े 
गुजरात दंगों से जुड़े मामलों को लेकर अदालती लड़ाई लडऩे वाली मशहूर मानवाधिकार कार्यकर्ता तीस्ता सीतलवाड़ और उनके पति जावेद आनंद को केन्द्र की मोदी व गुजरात की भाजपा सरकार परेशान करने का कोई भी मौका चुकती नही है। 

हाल ही में गुजरात सरकार ने तीस्ता और उनके एनजीओं सिटीजन फॉर जस्टिस एंड पीस पर पैसों को शराब पर खर्च करने का आरोप लगाया है। इस आरोप को लेकर सुप्रीम कोर्ट में तीस्ता और गुजरात सरकार के वकील के बीच तीखी बहस भी देखने को मिली है। एक तरफ सरकारी वकील ने तीस्ता पर एनजीओ के पैसे का दुरुपयोग करने का इल्जाम लगाया, वहीं तीस्ता ने सरकार पर आरोप लगया कि इस तरह के प्रयास उनकी गतिविधियों को शिथिल करने के लिए किए जा रहे है। 

हाल ही में सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस दीपक मिश्रा और जस्टिस ए.एम.खानविल्कर की पीठ तीस्ता की याचिका पर सुनवाई कर रही थी। यह याचिका तीस्ता, उनके पति और उनके एनजीओ के बैंक खाते को फ्रीज करने से जुड़ी है। इस केश की सुनवाई में अडिशनल सॉलिसिटर जनरल(एएसजी) तुषार मेहता ने कोर्ट को बताया कि तीस्ता ने एनजीओ के धन का इस्तेमाल अपने व्यक्तिगत काम के लिए किया और कर रही हैं। इसमें शराब का सेवन करना भी शामिल है। 

गुजरात सरकार की तरफ से कोर्ट में दलील दे रहे मेहता ने ये भी बताया कि शराब पर खर्च धर्मनिरपेक्ष शिक्षा की श्रेणी में बताकर किया गया। इसके साथ ही उनने सीतलवाड को हिरासत में लेकर पूछताछ करने की इजाजत भी मांगी। इधर, तीस्ता और उनके पति की तरफ से कोर्ट पहुंचे वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल और वकील अपर्णा भट्ट ने पीठ को बताया कि ऐक्टविस्ट की छवि को खराब करने के लिए अनावश्यक रूप से शराब के सेवन का मुद्दा उठाया गया है। तीस्ता के वकील सिब्बल ने कोर्ट को बताया कि शराब सहित हर तरह के व्यय की मंजूरी फोर्ड फाउंडेशन ने दी है जिसने दान किया है। गुजरात सरकार जानबूझ कर उन्हें निशाना बना रही है। बीते सात सालों में 7,850 रुपये शराब पर खर्च किए गए है जो किसी भी तरह से अपराध नहीं है। जब फाउंडेशन की तरफ से कोई शिकायत नहीं की गई है तो यह अपराध किस तरह हुआ। इधर इस मामले में तीस्ता का कहना है कि मैंने किसे धोखा दिया? क्या पैसा सरकार द्वारा दिया गया है। नहीं, यह फाउंडेशन द्वारा दिया गया है और फाउंडेशन ने इसको लेकर कोई आरोप नहीं लगाया है। अगर हम अपने काम के सिलसिले में लोगों से मिलते हैं और भोजन और पेय साथ लेकर जाते हैं, तब यह कोई अपराध नहीं होता। इधर, एएसजी का कहना है कि यह शिकायत तीस्ता और उनके पति के खिलाफ गुलबर्ग सोसायटी के एक व्यक्ति द्वारा दर्ज की गई है। पुलिस उनके खिलाफ कार्रवाई कर जांच करे। हालाकि इस मामले में पीठ ने अपना आदेश सुरक्षित रख लिया है। बता दे कि तीस्ता और उनके पति जावेद आनंद के खिलाफ पिछले दिनों सीबीआइ कार्रवाई कर चुकी है। गुजरात पुलिस ने भी हलफनामा भरा था। बरसों से दोनों को परेशान करने में गुजरात पुलिस लगी हुई है। इनको परेशान करने का कोई भी मौका पुलिस हाथ छोडऩा नही चाहती है। गुजरात सरकार के इशारे पर पुलिस इन्हें किसी न किसी तरह गिरफ्तार करने की जुगत में लगी रहती है। अगर तीस्ता और जावेद गिरफ्तारी से अब तक बचे हुए हैं, तो इसका श्रेय न्यायपालिका के हस्तक्षेप को ही जाता है।
 हालाकि इन कार्यवाहियों को लेकर मानवाधिकार संगठनों और लोकतांत्रिक मूल्यों के लिए संघर्षरत संस्थाओं के बीच बेहद तीखी प्रतिक्रियाएं सामने आई है। इधर जब से केन्द्र में भाजपा की सरकार सत्तारूढ़ हुई है तब से सीतलवाड़ जैसे सामाजिक कार्यकर्ताओं के साथ उत्पीडऩ का सिलसिला ओर भी तेज हो गया है। खैर। तीस्ता और गुजरात सरकार जब-तब आमने- सामने क्यों होते रहते है इसके रहस्य को जानने के लिए हमें सन 2002 में चलना पड़ेगा। बता दे कि तीस्ता और जावेद 2002 के गुजरात दंगों के समय से ही भाजपा की आंख की किरकिरी बने हुए है। इनने 2002 के गुजरात दंगों के बारे में तथ्य इक_ा कर एक विस्तृत रिपोर्ट प्रकाशित की थी इसके चलते भाजपा की खासकर तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी की खासी किरकिरी हुई थी। इनने दंगा-पीडि़तों की पैरवी के इंतजाम किए थे। इसके साथ ही सर्वोच्च न्यायालय में गुहार लगाई थी कि मामलों की सुनवाई गुजरात से बाहर हो। जो आरोपी निचली अदालत से जमानत पर छूटे थे उनके खिलाफ ऊपरी अदालत में अपील दायर की थी। यह सब मोदी और भाजपा को कैसे रास आ सकता है?
इन्ही सब मामलों को लेकर तीस्ता, गुजरात सरकार और मोदी आमने-सामने होते रहते है। सीतलवाड़ को इसका खामियाजा भी भुगतना पड़ रहा है। वह अपने ऊपर होने वाली ज्यादतियों को समय-समय पर मीडिय़ा के माध्यम से आमजन तक भी पहुचांती रही है। एक मीडिय़ा चैनल के समक्ष अपनी बात का रखते हुए तीस्ता ने बेबाकी से कहा कि हमारे संगठन, सिटीजन फॉर जस्टिस एंड पीस ने गोधरा कांड के बाद गुजरात में फैले दंगे में मरने वालों की सही संख्या पता करने की ईमानदार कोशिश की है। गोधरा कांड के बाद 28 फरवरी 2002 से अब तक बड़े पैमाने पर फैले दंगे में 1,926 लोगों की मौत हुई है जबकि गुजरात सरकार के आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक दंगों में 1,044 लोगों की मौत ही बताई गई है। जो लोग मौत के घाट उतारे जा चुके है उनमें 790 मुस्लिम और 254 हिंदू थे। इस समय तीस्ता मृतकों की संख्या के राज्य सरकार के फर्जीवाड़े को उजागर करने के साथ ही लापता हुए लोगों की सही संख्या सामने लाने के लिए प्रयासरत है। एक बार मृतकों और लापता लोगों के बारे में आंकड़े इक_ा हो जाने के बाद इस मामले को  संसद में विपक्षी सदस्यों के जरिये उठाना चाहती है ताकि पार्लियामेंट अपने रिकार्ड में इसे ठीक कर सके। बकौल तीस्ता वर्ष 2002 में गुजरात में हुए नरसंहार की साजिश रचने वाले 157 आरोपियों के खिलाफ मुकदमे चले और इनमें से 142 को आजीवन कारावास मिला। एक दर्जन से अधिक मुकदमों में इतने ही लोगों को जेल की सलाखों के पीछे भेजने में कामयाबी हासिल हुई है। सीजेपी जिन अन्य मामलों में अदालती लड़ाई लड़ रहा है - वह बिलकीस बानो, एरल, घोड़ासार और सेसान के मामले है। हालांकि उन्हें अफसोस है कि पंढरवाड़ा और किडियाड़ नरसंहार के मामलों में अदालती लड़ाई को पुलिस ने छोड़ दिया। (यहां एक टेंपो के अंदर 61 मुस्लिमों को जला कर मार डाला गया था)। तीस्ता का मानना है कि जाकिया जाफरी मामले में भी बहुत जद्दोजहद का सामना करना पड़ा। इस मामले ने पुलिस से लेकर गुजरात हाई कोर्ट और फिर मजिस्ट्रेट कोर्ट तक लंबी पीड़ादायक यात्रा लड़ी। जाकिया जाफरी के मामले को लेकर सिटीजन फॉर जस्टिस एंड पीस पर राज्य की एजेंसिंयों के काफी कुत्सित हमले हुए। स्वंय मेरे और मेरे पति जावेद आनंद के अलावा संस्थान के पदाधिकारियों पर हमले हुए। जितनी ज्यादा अदालती लड़ाई लड़ी, उतने ही तेजी से हमले हुए। भारतीय इतिहास में इस तरह के सामूहिक अपराध के लिए नेतृत्व को जिम्मेदारी लेने के लिए बाध्य करने वाली अपनी इस कानूनी लड़ाई की बारे में तीस्ता का स्पष्ट मानना है कि - गुजरात में इस तरह के सामूहिक अपराध का दौर 28 फरवरी 2002 से ही चल रहा है। जब तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने 5-6 मई, 2002 को राज्य के हालात का जायजा लेने के लिए केपीएस गिल को भेजा था तब तक भी हिंसा का यह दौर कम नहीं हुआ था। गुजरात दंगों को लेकर तीस्ता की यह सक्रियता भाजपा को कतई रास नही आएगी और आना भी नही चाहिए। अभी देश में भाजपा और मोदी के प्रति भारतीय जनमानस का जो मन बना हुआ है उसको खराब करने वाली तीस्ता क्यों रास आएगी। हालाकि ये बात दीगर है कि जब-जब भी तीस्ता पर हमला बोला गया तब-तब मानवाधिकार संगठनों और लोकतांत्रिक मूल्यों के लिए संघर्षरत संगठनों ने खुलकर सपोर्ट किया ह। इनके बीच स्वाभाविक ही तीखी प्रतिक्रियाएं भी हुई है। हालाकि इन मानवाधिकार संगठनों के सहयोग के बावजूद तीस्ता सीतलवाड़ उनके पति और उनकी संस्थान के लोगों पर खुल कर होने वाले हमले कम नही हो रहे है। गुजरात पुलिस तो जब- तब परेशान करने के रास्ते अपनाते रहती है। बीते दिनों गुजरात पुलिस ने सीतलवाड़ दंपति की अग्रिम जमानत का विरोध करते हुए सर्वोच्च न्यायालय में हलफनामा पेश कर दिया था। कथित तौर पर गुजरात सरकार के दबाव में पुलिस कभी भी हमला बोल देती है। कोर्ट में हलफनामा पेश करना तो हमलों की एक बानगी भर है। हालाकि इस हलफनामे को लेकर गुजरात सरकार की साख पर सवालिया सवाल भी उठे लेकिन सरकारी तंत्र के दुरूपयोग की ऐसी अनेक मिसाले कायम है। इनका मकसद तीस्ता और जावेद की प्रतिष्ठा को चोट पहुंचानेे के साथ ही उनकी गिरफ्तारी की गुंजाइश निकालना रहता है। बता दे कि यह हलफनामा पेश करते समय भी गुजरात पुलिस ने आरोप लगाया था कि इन दोनों ने सीजेपी यानी सिटिजंस फॉर जस्टिस ऐंड पीस और सबरंग न्यास को मिले धन में हेराफेरी की, उसे निजी, यहां तक विलासितापूर्ण खर्चों के लिए इस्तेमाल किया और साक्ष्य नष्ट कर दिए थे। हालाकि उस समय पुलिस की बताई इस कहानी पर ढेरों सवाल उठे थे। सबसे लाजिमी सवाल तो ये खड़ा हुआ कि अगर दोनों संस्थाओं के धन का ऐसा बेजा इस्तेमाल हो रहा था तो उनके बाकी न्यासी क्या कर रहे थे? सीजेपी का गठन सामाजिक सौहार्द और न्याय में यकीन रखने वाले मुंबई के ग्यारह प्रतिष्ठित नागरिकों ने अप्रैल 2002 में  किया था। इसके संस्थापक-अध्यक्ष मराठी के मशहूर नाटककार विजय तेंदुलकर थे और वे मई, 2008 तक, मृत्युपर्यंत इस पद पर बने रहे। सीजेपी का पहला काम सर्वोच्च न्यायालय के प्रधान न्यायाधीश रहे वीआर कृष्ण अय्यर के नेतृत्व में हो रहा था। इसके साथ ही अन्य कई पूर्व न्यायाधीशों को शामिल कर एक नागरिक न्यायाधिकरण का गठन किया गया। बेशक गुजरात पुलिस ने सीजेपी और सबरंग को मिले धन के हर तरह के बेजा इस्तेमाल का आरोप लगाया लेकिन इन दोनों संस्थाओं के साल-दर-साल ऑडिट होते रहे और यह काम ऑडिट की प्रतिष्ठित फर्मों से कराया गया। गुजरात उच्च न्यायालय में आय-व्यय के हजारों पन्नों के दस्तावेज जमा किए गए। गुजरात पुलिस की अपराध शाखा को भी इन दस्तावेजों से अवगत कराया गया। ऑडिट करने वाली फर्मों ने भी अपनी रिपोर्टों में अनियमितता का एक भी मामला नहीं पाया। फिर भी गुजरात पुलिस एक पर एक धांधली और गबन के किस्से गढ़ती रही। हाल ही में सुप्रीम कोर्ट मेंं अडिशनल सॉलिसिटर जनरल(एएसजी) तुषार मेहता के द्वारा जस्टिस दीपक मिश्रा और जस्टिस ए.एम.खानविल्कर की पीठ के समक्ष रखी गई पैसों के दुरूपयोग व शराब के सेवन में उपयोग में लेने की बात भी तीस्ता और उनके पति को परेशान करने की ओर ही इशारा करती है। प्रदेश में चुनाव करीब है। दंगों का दंश कहीं भाजपा के लिए दाग बन कर न उभरे ये रिश्क क्यों ली जाए। एक समझदार नेता और राजनीतिक दल की समझ तो यही कहती है कि ऐसे वक्त में तीस्ता को उलझा कर रखने में ही भलाई है। तीस्ता भी इस बात को स्वीकार करती है कि पिछले दस महीनों से राज्य की एजेंसिंयों द्वारा उन पर हमले अधिक बोले गए है। गुजरात पुलिस और प्रशासन उन्हें धमकी देने, अपमानित करने और फंसाने की एक के बाद एक कई कोशिश कर रही है। फर्जी मामले बनाए गए और जेल भेजने तक की धमकी दी गई। इन हमलों के मामले में वह साफ मानती है कि ये प्रपंच गुजरात दंगों के शिकार लोगों को अदालती मदद की उनकी कोशिश से ध्यान हटाने के लिए रचे जा रहे है। अहम बात यह है कि गुजरात दंगों के मामलों को आपराधिक साजिश के दायरे में लाने की कोशिश काफी जद्दोजहद भरी है। बहरहाल इस तरह के हमले तो यही इशारा कर रहे है कि कहीं न कही पुलिस पर राज्य सरकार दबाव बना रही है।

(लेखक मीडिय़ा रिलेशन पत्रिका का संपादन करने के साथ ही सम-सामयिक विषयों पर कलम चलाते है। ये उनके निजी विचार हैं)
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