हिंदुस्तान की सियासत की नई सनसनी ओवैसी की पूरी कहानी

हिंदुस्तान की सियासत की नई सनसनी ओवैसी की पूरी कहानी

लखनऊ।  बिहार विधानसभा चुनाव में असदुद्दीन ओवैसी ने एंट्री ले ली है। ओवैसी की पार्टी यूपी में 35 सीटों पर चुनाव लड़ रही है।
  

असदुद्दीन ओवैसी का परिचय

असदुद्दीन ओवैसी का जन्म 13 मई 1969 को हैदराबाद में हुआ था। उनकी शादी 1996 में फरहीन ओवैसी से हुई थी। उनकी पांच बेटियां और एक बेटा है। उनकी आरंभिक शिक्षा 1973 से 1983 तक हैदराबाद पब्लिक स्कूल से हुई। 1984 से 1986 तक वे सेंट मैरी जूनियर कॉलेज में पढ़े। 1986-89 के दौरान उन्होंने निजाम कॉलेज से बीए किया और 1989-1994 में उन्होंने लंदन के लिंकन कॉलेज से बैरिस्टर की डिग्री हासिल की।
13 मई 1969 को हैदराबाद में जन्मे असदुद्दीन ओवैसी 2008 से ऑल इंडिया मजलिस ए इत्तेहादुल मुस्लिमीन के अध्यक्ष हैं। वे ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड, नई दिल्ली के संस्थापक सदस्य हैं और 1971 में स्थापित एक गैरराजनीतिक संगठन दार-उस-सलाम बोर्ड के चेयरमैन भी हैं। 1994 और 1999 में वो हैदराबाद की चारमीनार विधानसभा सीट से विधायक रहे और 2004, 2009 और 2015 में हैदराबाद लोकसभा सीट से सांसद चुने गए। 15वीं लोकसभा में असदुद्दीन ओवैसी को संसद रत्न अवार्ड से भी नवाजा जा चुका है। एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स वेबसाइट के मुताबिक 2014 में असदुद्दीन ओवैसी की कुल संपत्ति 4 करोड़ से ज्यादा थी। उन पर 1 करोड़ से ज्यादा की देनदारी है। ट्विटर पर उनके 76 हजार फॉलोअर हैं। फेसबुक पर साढ़े तीन लाख फॉलोअर हैं। असदुद्दीन ओवैसी पर वर्तमान में 4 मुकदमे चल रहे हैं। असदुद्दीन ओवैसी को वर्ष 2005 में तेलंगाना के मेडक जिले में जिला अधिकारी को धमकी देने के आरोप में जेल भेजा गया था।

MIM का इतिहास

एमआईएम की स्थापना करीब 94 साल पहले हैदराबाद में हुई थी। शुरुआत में ये एक गैरराजनीतिक संगठन हुआ करता था। इस संगठन का मकसद मुसलमानों को एक मंच पर लाना था, लेकिन बदलते दौर के साथ ये मंच पूरी तरह एक राजनीतिक पार्टी में तब्दील हो गया। देश की आजादी के 20 साल पहले हैदराबाद पर निजाम उस्मान अली खान का राज था। नवाब महमूद नवाज ने 1927 में मजलिसे इत्तेहादुल मुस्लमीन नाम के सांस्कृतिक संगठन की नींव रखी। 1938 में इस संगठन का पहला अध्यक्ष बहादुर यार जंग को बनाया गया था। एमआईएम के संस्थापक सदस्यों में हैदराबाद के एक राजनेता सैयद कासिम रिजवी भी शामिल थे जो रजाकार नाम के हथियारबंद लड़ाकू संगठन के मुखिया भी थे।
जाकार और एमआईएम निजाम हैदराबाद के समर्थकों में शुमार किए जाते थे। 1947 में जब भारत आजाद हुआ तो हैदराबाद के भारत में विलय का कासिम रजवी और उसके रजाकारों ने जमकर विरोध भी किया था। नवंबर 1947 में भारत के पहले गृहमंत्री सरदार पटेल और कासिम रजवी की दिल्ली में मुलाकात हुई थी। 1947 आते-आते निजाम और उनकी सरकार पूरी तरह से रजवी की गिरफ्त में आ चुकी थी। 10 सिंतबर 1948 को सरदार पटेल ने हैदराबाद के नवाब को एक खत लिखा जिसमें उन्होंने हैदराबाद को हिंदुस्तान में शामिल होने का आखिरी मौका दिया था, लेकिन हैदराबाद के निजाम ने जब सरदार पटेल की अपील ठुकरा दी तो इसके जवाब में भारतीय सेना ने 13 सितंबर 1948 को हैदराबाद पर चारों तरफ से धावा बोल दिया और आखिरकार निजाम हैदराबाद को झुकना पड़ा।

कैसे राजनीतिक पार्टी बनी AMIM

हैदराबाद के भारत में विलय के बाद मजलिसे इत्तेहादुल मुस्लेमीन संगठन कुछ सालों तक निष्क्रिय पड़ा रहा, लेकिन साल 1958 में एक बार फिर एमआईएम एक नई सोच के साथ राजनीति के अखाड़े में कूद पड़ा। 1958 में मजलिस इत्तेहादुल मुसलेमीन को हैदराबाद के ही मशहूर वकील मौलवी अब्दुल वहीद ओवैसी ने दोबारा सक्रिय किया था। 1959 में एमआईएम ने चुनावी राजनीति में अपना पहला कदम रखा और हैदराबाद म्यूनसिपैलिटी के उपचुनाव में वो दो सीटें जीतने में कामयाब भी रही थी। ये वो पहली जीत थी, जिसके बाद एमआईएम का उदय हुआ। 1984 के बाद से हैदराबाद लोकसभा सीट पर एमआईएम का कब्जा है। सलाउद्दीन ओवैसी हैदराबाद से लगातार छह बार सांसद रह चुके हैं। 2009 के चुनाव में एमआईएम ने विधानसभा की सात सीटें जीतीं जो कि उसे अपने इतिहास में मिलने वाली सब से ज्यादा सीटें थीं। महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव में एमआईएम ने दो सीटें जीती हैं। अब उसके निशाने पर पश्चिम बंगाल और उत्तर प्रदेश जैसे राज्य आ गए है। पश्चिम बंगाल में 25 फीसदी मुसलमान है जो तृणमूल कांग्रेस के पाले में जाते रहे हैं और एमआईएम इन राज्यों में मुस्लिम वोट बैंक में सेंध लगाना चाहती है। एमआईएम ने औरंगाबाद नगर निगम चुनाव में शानदार प्रदर्शन किया था। एमआईएम ने यहां 25 सीटें जीतीं। इस जीत के साथ ओवैसी बंधुओं (असदुद्दीन और अकबरुद्दीन) का प्रभाव महाराष्ट्र में और बढ़ गया है। हालांकि, औरंगाबाद नगर निगम का कंट्रोल बीजेपी-शिवसेना गठबंधन के पास ही है, जिन्होंने 113 में 58 सीटें जीतीं। कांग्रेस को महज 10 सीटें, जबकि एनसीपी को 3 सीटें मिलीं। अब ओवैसी बंधुओं के निशाने पर बिहार विधानसभा चुनाव है। मुस्लिम वोट बैंक को लालू का आधार वोट माना जाता है और ओवैसी अगर इस मुस्लिम बहुल इलाके में उम्मीदवार उतारते हैं तो फिर लालू-नीतीश के वोट बैंक में सेंध लगना तय माना जा रहा है।

औवेसी की ताकत का राज

असदुद्दीन औवेसी की राजनीतिक शैली और आक्रामकता उन्हें दूसरे अल्पसंख्यक नेताओं से अलग खड़ा करती है। उनकी ताकत है मुद्दों पर पकड़, बातचीत का स्पष्ट व तर्कपूर्ण लहजा तथा उग्रता। यही वजह है कि उन्हें आजम खान और अबु आजमी की कतार में नहीं खड़ा किया जाता। बात चाहे संसद में बोलने की हो या किसी इंटरव्यू में पत्रकारों के तीखे सवालों का सामना करने की, औवेसी की बातचीत में जो आत्मविश्वास और आक्रामकता दिखती है वो अल्पसंख्यकों खासकर मुस्लिम युवाओं पर अलग प्रभाव छोड़ती है। वे सोशल मीडिया पर खासे एक्टिव हैं और इसके जरिए पब्लिक से कनेक्ट रहते हैं। न्यूक्लियर डील के समय दूसरे मुस्लिम नेताओं के विपरीत उन्होंने अमेरिका से डील का समर्थन किया था। पीएम मोदी के आह्वान पर हाल ही में उन्होंने एलपीजी गैस सब्सिडी छोड़ी और इसका फोटो ट्विटर पर शेयर किया। ओवैसी ने महाराष्ट्र में बीफ बैन का विरोध किया, लेकिन इसका कारण कोल्हापुर के चप्पल उद्योग के प्रति अपनी चिंता को बताया। याकूब मेनन की फांसी का सीधे-सीधे विरोध की बजाय राजीव गांधी के हत्यारों और देवेंद्र सिंह भुल्लर व बलवंत सिंह राजोआना की फांसी की मांग की। वे ध्रुवीकरण की राजनीति करने वाले हिंदू नेताओं को उन्हीं की भाषा में जवाब देने का दावा करते दिखाई देते हैं। हिंदी, उर्दू और अंग्रेजी पर उनकी अच्छी पकड़ है और वे यूपी और बिहार में मुस्लिम वोटों के भरोसे बैठे नेताओं का चुनावी गणित बिगाड़ने का माद्दा रखते हैं।

विवादित बयानों से चर्चा में

राजनीति के अलावा ओवैसी भाई अपने विवादित बयानों की वजह से हमेशा चर्चा में रहते हैं। सलाउद्दीन ओवैसी की राजनीतिक विरासत को उनके दो बेटे असदुद्दीन और अकबरुद्दीन ओवैसी बखूबी संभाल रहे हैं। दोनों भाई अपने पिता के नक्शे कदम पर चलते हुए मुसलमानों का मसीहा बनने की कोशिश करते दिखते हैं। असदुद्दीन ओवैसी सांसद हैं और अकबरुद्दीन ओवैसी विधायक हैं। अकबरुद्दीन को ओल्ड सिटी का बाहुबली माना जाता है। वह पहली बार तब सुर्खियों में आए थे, जब उन्होंने लेखिका तस्लीमा नसरीन को जान से मारने की बात कही थी। यूं तो अकबरुद्दीन ने लंदन से बैरिस्टर की पढ़ाई की है। वह और उनके भाई हैदराबाद के पॉश बंजारा हिल्स इलाके में रहते हैं, लेकिन उनकी राजनीति की जड़ें ओल्ड सिटी में हैं, जहां की 40 फीसदी आबादी मुसलमानों की है। वक्फ बोर्ड और मुस्लिम शिक्षा संस्थानों में इनकी मजबूत पकड़ है। अकबरुद्दीन ओवैसी के पिता सलाउद्दीन ओवैसी ने हैदराबाद ओल्ड सिटी में पत्तार्गुत्टी से चुनाव लड़ा था और बाद से हमेशा ओल्ड सिटी से चुनाव लड़ते और जीतते आए हैं। भड़काऊ भाषण देने के आरोप में अकबरुद्दीन ओवैसी को जेल भी जाना पड़ा था।

ओवैसी के विवादित बयान

2014 में लोकसभा चुनाव से पहले असदुद्दीन ओवैसी ने हैदराबाद में पीएम मोदी के खिलाफ भड़काऊ भाषण दिया था। उन्होंने पीएम के खिलाफ काफी अपशब्द कहे थे, जिसके लिए उनकी काफी आलोचना हुई थी। याकूब मेमन की फांसी की सजा का भी ओवैसी बंधुओं ने विरोध किया था। असदुद्दीन ओवैसी ने यह कहकर विवाद खड़ा कर दिया था कि याकूब को मुस्लिम होने की वजह से फांसी की सजा दी जा रही है। 2011 में अकबरुद्दीन ने कहा था कि अगर पूर्व प्रधानमंत्री पीवी नरसिंह राव अपने आप न मर गए होते तो वो अपने हाथों से उन्हें मार देते। अकबरुद्दीन ने विवादित बयान देते हुए कहा था कि अगर कसाब को फांसी दी गई, तो गुजरात दंगों के लिए नरेंद्र मोदी को भी फांसी दी जानी चाहिए। असदुद्दीन ओवैसी ने बॉलीवुड स्टार सलमान खान पर निशाना साधते हुए उन्हें ‘बेवड़ा साहब’ कहा था। विधानसभा सीट के लिए होने वाले उपचुनाव में एक सभा को संबोधित करते हुए सलमान खान को हिट एंड रन मामले में जमकर लताड़ लगाई थी। ओवैसी ने सलमान को गैरजिम्मेदार बताया था। असदुद्दीन ओवैसी ने महाराष्ट्र में गोमांस पर प्रतिबंध लगने के बाद शराब पर भी पाबंदी की वकालत की थी।

असदुद्दीन ओवैसी की राजनीतिक प्रोफाइल

1994-99—विधायक, चारमीनार, हैदराबाद
1999-2003-विधायक, चारमीनार, हैदराबाद
2004-2009- लोकसभा सांसद, हैदराबाद
2004-2006-संसद की लोकल एरिया डेवलपमेंट स्कीम की कमेटी के सदस्य 2004-2006-संसद की सामाजिक न्याय और सशक्तिकरण पर बनी कमेटी के सदस्य 2006-2007-रक्षा मामलों की स्थायी समिति के सदस्य
2009-2014- लोकसभा सांसद, हैदराबाद
2009-2014-रक्षा मामलों की समिति के सदस्य 2009-2014-नीतिगत मामलों की कमेटी के सदस्य 2014-अब तक-लोकसभा सांसद, हैदराबाद
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