मुसलमानों को और उलमा को राजनीति में आना चाहिए या नहीं?

मुसलमानों को और उलमा को राजनीति में आना चाहिए या नहीं?

मेहदी हसन एैनी क़ासमी
इस वक़्त जबकि सम्पूर्ण भारत में अल्पसंख्यक खा़स कर मुस्लिम समुदाय राजनेतिक त्रासदी से गुज़र रहा है,मुसलमानों के राजनेतिक शोषण की वजह उनका राजनीति स्तर पर बगै़र लीडरशिप के अपाहिज और वोटबैंक बन कर रह जाना है। 

सिखों और दलितों के अपने पैर पर खड़े हो जाने के बाद अब मुस्लिम समुदाय के नौजवानों और बुद्धजीवियों की तरफ़ से मुस्लिम समाज को बेदार करने की मुहिम चल पड़ी है,

ऐसे में भारतीय मुसलमानों के सबसे बड़े मज़हबी संस्थान दारुल उलूम देवबंद और मुसलमानों के मिल्ली रहनुमाओं व उलमा की ओर भी उंगलियां उठने लगी हैं,और लोग ये सवाल करने लगे हैं कि जिस संस्थान ने और जिन उलमा ने देश को अंग्रेज़ों से आज़ाद कराने में महत्वपूर्ण योगदान दिया था, आज़ादी के बाद वो देश की राजनीति से दूर क्यों हो गये?

और अब जबकि मुस्लिम समाज के तमाम मसाईल की वजह उनका राजनेतिक पतन है, ऐसे में दारुल उलूम देवबंद ने अपना दरवाज़ा राजनीति और राजनेताओं के लिये क्यों बंद कर लिया है? 
दारुल उलूम देवबंद  और उलमा ए किराम की सियासत से दूरी का शिकवा हमेशा से किया जाता रहा है, पर इस पूरे मुवमेंट को समझने के लिये कुछ बातें समझनी होंगीं,तब फैसला आपके हाथों में होगा कि इस संस्थान का सियासत से दूरी बनाये रखने का फैसला किस हद तक सही और क़ौम के हक़ में है.

01.दारुल उलूम देवबंद का एक इतिहास उसके वजूद में आने का था यानी 1866का, जो 1857 के शामली जंग में अंग्रेज़ों से हारने के बाद का था, उस वक़्त दारुल उलूम का मक़सद सिर्फ़ और सिर्फ़ एक छावनी बना कर शीराज़ाबंदी करनी थी, कैडरस को जोड़ना और उन्हें तालीम व तरबियत से लैस करके मुल्क की आज़ादी के लिये तैयार करना,और दारुल उलूम उसमें कामयाब रहा 02.दूसरा दौर दारुल उलूम का 1900 ई.के बाद का है, जब इस इदारे ने शैखूल हिंद मौलाना महमूद हसन देवबंदी के ज़रिये से पूरी एक खेप मुजाहिदीन ए आज़ादी की तैयार कर दी थी, जिस खेप में मौलाना उबैदुल्लाह सिंधी से मौलाना हुसैन अहमद मदनी तक के एैसे स्कॉलरस की जमात थी जिसने हर मुहाज़ पर जाकर अंग्रेज़ों की कमर तोड़ी..

शैखूल हिंद और मौलाना सिंधी र.ने तहरीक ए रेशमी रूमाल चलाई,जो किसी वजह से नाकाम हुई,बड़े पैमाने पर उलमा जेल भेजे गए.दसियों साल उलमा ने माल्टा के जेल में गुज़ारा,उधर जौहर ब्रदर्स की तहरीक ए ख़िलाफ़त भी नाकाम रही,जब शैखुल हिंद माल्टा से वापिस आये तब उन्हें लगा कि अब खिलाफ़त व हुकूमत की तहरीक को छोड़ कर इस जंग को सिर्फ़ मुसलमानों तक सीमित  ना किया जाये,बल्कि हिंदू मुस्लिम सिख ईसाई सभी को मिलकर अंग्रेज़ मुक्त भारत की लड़ाई लड़ी जाये,चूंकि 100 साल तक सिर्फ़ बलिदान और ख़ून की कुरबानी दी गयी थी, जिसके नतीजे में अंग्रेज़ों की कमर टूट चुकी थी, अब सिर्फ़ हिकमत के साथ उन्हें भारत छोड़ने पर मजबूर करना था, इस लिये 1919 में मिल्ली व क़ौमी मसाईल के हल के लिये जमीयत उलमा ए हिंद के नाम से देवबंद के स्कॉलरस ने एक संगठन की नींव रखी,जिसने आज़ादी की लड़ाई में कांग्रेस के साथ मिलकर भारत को आज़ादी दिलाई,महात्मा गांधी को आज़ादी की लड़ाई का नायक बना दिया गया, उधर शुद्धीकरण जैसे मुहिम से मुसलमानों को बचाने के लिये  देवबंद के ही एक लीजेंड स्कॉलर मौलाना इलियास र. ने तहरीक ए तबलीग़ के नाम से साधारण मुसलमानों को इस्लाम सिखाने और उनकी दीनी तरबियत करने के लिये एक तहरीक की बुनियाद डाली जो आज तक अपने मिशन में लगी हुई है, अंग्रेज़ों ने मुसलमानों में फूट डालने के लिये कई लोगों को ख़रीद कर उनसे अलग अलग फिरक़े बनवाये, इससे सही इस्लाम का चेहरा धूमिल होने लगा तब देवबंद के एक दूसरे बड़े स्कॉलर और दारुल ऊलूम देवबंद के सरपरस्त मौलाना रशीद अहमद गंगोही र. व  मौलाना अशरफ़ थानवी र. ने इसका बीड़ा उठाया, और हज़ारों किताबें लिखकर हर फितने का जवाब दिया और सही इस्लाम का चेहरा पेश किया.

देश आज़ाद हुआ,दारुल ऊलूम देवबंद की स्थापना का मक़सद पूरा हुआ, आज़ादी के बाद दारुल ऊलूम के सामने दो रास्ते थे,
01.इस्लाम की हिफ़ाज़त और उसकी इशाअ़त,
02.मुसलमानोॆ के मसाईल पर आवाज़ उठाना,और उनके मुद्दों पर काम करना,
दारुल ऊलूम ने इस्लाम की हिफ़ाज़त और सही इस्लाम की तबलीग़ का काम संभाल लिया, अब दारुल उलूम देवबंद ने ख़ूद को तालीम तक सीमित कर लिया,क्योंकि मुस्लिम समुदाय सही इस्लाम से दूर होता जा रहा था,
ग़रीबी की वजह से मुसलमान अपने बच्चों को शिक्षा नहीं दे पाते थे, दारुल उलूम देवबंद ने बिल्कुल मुफ्त शिक्षा का इंतिज़ाम किया, और देश भर से आने वाले बच्चों को इस्लाम की उच्चशिक्षा दी, उन्हें आलिम,मुफ्ती,क़ारी,हाफि़ज़, बना कर पूरे देश में फैला दिया, इन स्कॉलरस ने देश भर की मस्जिदें संभाल लीं,अपने अपने क्षेत्र में हज़ारों की तादाद में मदरसे और मकतब खोले,और बड़ी तादाद में ग़रीब, फ़क़ीर,मिस्कीन बच्चों को इंसान बनाया,और ये सिलसिला आज तक जारी है,मज़ाहिर उल ऊलूम सहारनपूर और नदवतुल उलमा जैसे बड़े इदारों ने इस मिशन को आगे बढ़ाने में महत्वपूर्ण योगदान दिया.

उधर देश के विभाजन और पाकिस्तान बनने की घोर विरोधी जमीयत उलमा ए हिंद मुसलमानों के बुनियादी मुद्दों को सामने रख कर चैरिटी और वेलफेयर का काम मुल्क भर में करने लगी, दंगोॆ के बाद रिलीफ़ से लेकर बेगुनाहों की रिहाई तक का बड़ा काम जमीयत ने संभाला, सिलसिला चलता रहा,70 साल यूंही गुज़र गये,जमीयत सेक्यूलरिज़्म का और गंगा जमुनी तहज़ीब को अपने सीने से लगायी रही, और बड़े बड़े कांफ्रेस व जलसे करके मॉयनरटीज़ के हर मुद्दे को उठाती रही. इस बीच जब शरीयत व मुस्लिम परसनल लॉ पर सरकारी व अदालती दबाव बढ़ने लगा तो उलमा ने "मुस्लिम परसनल लॉ बोर्ड" के नाम से एक बड़ा प्लेटफार्म बनाया,जो पहले दिन से फाईट कर रहा है..

दारुल ऊलूम देवबंद की हैसियत अब एक सरपरस्त की हो गई थी, जब भी मुसलमानों पर कोई बड़ा मसला आया,दारुल ऊलूम ने रहनुमाई कर दी, जमीयत और दूसरे संगठन इस पर काम करने लगे......
आतंकवाद के खिलाफ़ भी सबसे पहली और बड़ी आवाज़ दारुल ऊलूम देवबंद ने ही उठाई थी.

लेकिन इन सब के बावजूद इंसाफ़ के साथ ये एतराफ़ करना चाहिए कि आज़ादी के बाद से भारतीय मुसलमान एक मैदान में पिछड़ते रहे और आज 70 साल के बाद पिछड़ते पिछड़ते अपने ही देश में दूसरे दर्जे के शहरी बनने के क़रीब पहुंच चुके हैं,

"और वो है सियासत का मैदान"

उसकी सबसे बड़ी वजह फर्ज़ी सेक्यूलरिज़्म को गले से लगाकर दूसरे के सहारे चलने का मिज़ाज है. जिसने आज भारतीय मुसलमान को कहीं का नहीं छोड़ा है. कांग्रेस पर अंधा एतमाद करके खूद का सियासी सेटअप खो देना और कांग्रेस की झोली में भारतीय मुसलमानों को वोटबैंक बना कर पेश कर देना ही शायद वो भूल है जिसने पिछले 70 साल में मुस्लिम समुदाय को 1 लाख से ज़्यादा दंगे,10 लाख से ज़्यादा बेगुनाहों को जेल, आतंकवाद का लेबल और बाबरी से दादरी तक का ज़ख़्म सौग़ात में दिया है. चूंकि मुसलमान क़ौम जज़्बाती होती है इसलिये बाबरी मस्जिद की शहादत के बाद यूपी में मुलायम व माया को अपना मसीहा समझ बैठी, और आसमान से गिर कर खजूर में अटक गये. दोनों नेताओं और पार्टियों ने मुसलमानोॆ को वोट बैंक बना कर खूब जमकर इस्तिमाल किया, फिर ज़ख्म खाये मुसलमान लॉ एंड आर्डर के नाम पर राजनीति करने वाली मायावती की झोली में भी गिरने लगे.

अब जबकि भारतीय मुसलमान ये समझने लगे हैं कि उनके पिछड़ेपन और पतन की वजह उनके आपस में झगड़े,दूरियां,और मस्लक के इख़्तिलाफ़ के साथ साथ राजनेतिक सौतेलापन है, इसी लिये पिछले कुछ सालों से मुसलमानों के  एक होने व मुत्तहिद होने  की पुकार देश भर से सुनायी दे रही थी,तभी पिछले दिनों भारतीय मुसलमानों की दो बड़ी विचारधाराओं (देवबंद व बरेली)के रहनुमा आगे आये और मंच तक साझा किया,

जमीयत ने इस इत्तिहाद मुहिम को आगे बढ़ाया,लेकिन चूंकि अब हर दिन मुसलमानों को मारा जा रहा है, नौजवानों को या तो जेल की सलाख़ोॆ के पीछे धकेल दिया जाता है या फासीवाद ताक़तें टैलेंटेड नौजवानों की हत्या कर देती हैं,सत्ताधारी पार्टियों से अदालतों तक हर जगह फाशिस्ज़म का झंडा लेकर मुसलमानों को चारों ओर से घेर कर बरबाद करने की कोशिश की जारही है,अल्पसंख्यकों को भयभीत किया जारहा है,रिज़र्वेशन के नाम पर मुस्लिम कम्यूनिटी को भिखारी बना दिया गया है,

और इन सब की वजह सियासी त़ौर पर मुसलमानों की कमज़ोरी और दूसरों के सहारे चलने की आदत है,

दारुल ऊलूम देवबंद और दूसरे बड़े मदरसे  तो एक ख़ालिस शिक्षण संस्थान हैं, जिनका मक़सद देश भर के ग़रीब नादार मुस्लिम बच्चों को उच्चइस्लामी तालीम से लैस करना है, और उनमें क़ौम की ज़िम्मेदारियों का इहसास पैदा करना है, इससे आगे बढ़ना दारुल ऊलूम देवबंद की हिकमतों के ख़िलाफ़ है, बल्कि एजेंसियों को फिर से नैजवानों के शिकार पर उकसाना है. तबलीग़ी जमात की बुनियाद आम  मुसलमानों को दीन व शरीयत की बुनियादी बातें सिखानी हैं, और उनकी तरबियत करनी है, इस लिये इसका भी सियासत से कोई लेना देना नहीं है, लेकिन दारुल ऊलूम देवबंद का बैनर लेकर पूरे भारत की सबसे बड़ी तंज़ीम बनने वाली जमीयत उलमा ए हिंद की ज़िम्मेदारी है कि वो अपनी सियासी सोच को बदले, जमीयत के दोनों विंग के क़रीब ढाई करोड़ मिम्बर हैं,लेकिन फिर भी वो मौलाना असद मदनी मरहूम के बाद से  आज तक उस तरह का दबाव सरकारों पर नहीं बना सकी जिसकी उससे उम्मीद थी....और इसकी वजह सियासी त़ौर पर कमज़ोर व अपाहिज होना है। 

इस लिये हमारे मिल्ली रहनुमाओं को ये समझ लेना चाहिए कि ये वक़्त मुस्लिम समुदाय को अपने पैरों पर खड़ा करने का है. ज़िम्मेदारों को चाहिए कि देवबंदी,बरेलवी,जमात ए इस्लामी और अहल ए हदीस वग़ैरह मसलकों के रहनुमाओं को लेकर मिल बैठें, शिक्षा,रिज़र्वेशन,ग़रीबी और सुरक्षा जैसे मुद्दों को लिस्टेड करें, और बंद कमरे की मीटिंगों को छोड़ कर खुले लफ्ज़ों में सभी पार्टियों के सामने ये एेलान करे कि जो भी पार्टी इन मांगों को पूरा करने का लिखित वादा करेगी हिंदुस्तानी मुसलमान उसी को वोट देंगें,और उस पार्टी से एक मुआहदा किया जाए, वरना तो फिर एक नये मुस्लिम लीडरशिप को ही लांच किया जाये. और देश भर में फैली छोटी छोटी लीडरशिप को एक बड़ा मंच देकर मुसलमानोॆ को अपने पैरों पर खड़ा करना चाहिए, क्योंकि स्थानीय रूप से हर दौर में मुस्लिम लीडरशिप रही है और आज भी है,बिहार में किसी ज़माने में इमारत ए शरिया ने सरकार बनवाई थी,तो  मौलाना बदरुद्दीन अजमल आसाम में एक मज़बूत सियासी पैठ बना चुके हैं,हैदराबाद में ओवैसी ब्रदर्स की मज़बूत पैठ है तो  यू.पी में पीस पार्टी और उलमा कौंसिल ज़मीनी पकड़ रखती हैं,केरला में मुस्लिम लीग तो तामिलनाड में  SDPI जैसी पार्टियां अपना सियासी वजूद रखती हैं,

लेकिन इन सभी को मुसलमानों का एतमाद और भरोसा चाहिए और वो एतमाद हमारी मिल्ली क़ियादत ही मुसलमानों में पैदा कर  सकती है, और हां  वरना बी.जे.पी जीत जायेगी के सिंड्रोम से भी अब हमारी क़ियादत को निकलना होगा.

ये भारतीय मुसलमानों की आवाज़ है, हमारी क़ियादत को इस पर लब्बैक कहना चाहिए,और एक नई सुबह का आग़ाज़ करना चाहिए,वरना अगर क़ौम मायूस हो गई तो उसके जज़्बाती क़दम कियादत के लिये भी और क़ौम के लिये भी नासूर बन जायेगा। 

मेहदी हसन एैनी कासमी
(मेहदी हसन एैनी कासमी स्वतंत्र पत्रकार हैं। मेहदी हसन एैनी कासमी देवबंद सहारनपूर यू.पी के स्कालर हैं। लेखक के विचार पूर्णत: निजी हैं, UPUKLive.com इसमें उल्‍लेखित बातों का न तो समर्थन करता है और न ही इसके पक्ष या विपक्ष में अपनी सहमति जाहिर करता है। इस लेख को लेकर अथवा इससे असहमति के विचारों का भी UPUKLive.com स्‍वागत करता है । इस लेख से जुड़े सभी दावे या आपत्ति के लिए सिर्फ लेखक ही जिम्मेदार है। आप लेख पर अपनी प्रतिक्रिया  upuklive@gmail.com पर भेज सकते हैं। ब्‍लॉग पोस्‍ट के साथ अपना संक्षिप्‍त परिचय और फोटो भी भेजें।)
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