सोशल मीडिया पर मैसेज का रिप्लाई कर दिया तो "धार्मिक", नहीं किया तो "रंडी"

सोशल मीडिया पर मैसेज का रिप्लाई कर दिया तो "धार्मिक", नहीं किया तो "रंडी"

सुशीला गुड़िया 
“अब शादी में सात की जगह आठ वचन लिये जायेंगें आठवा वचन होगा..... वाट्सएप और फेसबुक से ज्यादा वक्त मैं अपने पति को दूंगी ” 

यह एक चुटकुला है जो वाट्सप ग्रुप में बड़े मजे से चल रहा है और लोग ठहाका लगाने वाले स्माइली को रिप्लाई के रूप मे दे रहें हैं। इस तरह के महिला विरोधी हास्य चुटकुलों की भरमार है, जिसे लोग गम्भीरता से नही लेते हैं पर यह हम जैसी महिलाओं के लिए एक बहुत बड़ा सवाल है? 

सोशल मीडिया ने एक ऐसा स्पेस दिया है औरतों को जिसमें उन्होंने अपनी बात लेख के जरिये, कविता के जरिये या छोटी सी पोस्ट के जरिये अपनी प्रतिभा का लोहा भी मनवाया है और अपनी उपस्थिति को दर्ज कराते हुए इस रुढ़िवादी समाज को चुनौती भी दी है। इसके बावजूद यहां कई सारे सवालों को समझने की जरुरत है। 

सोशल मीडिया ने महिलाओं को सोचने समझने और सक्रिय रहने पर मजबूर किया है? सोशल मीडिया के जरिये महिलाओ ने अभिव्यक्ति के नए रास्ते को अख्तियार किया है? सवाल यह है कि सोशल मीडिया पर महिलाएं पितृसत्ता को चुनौती देने मे किस हद तक कामयाब हो पाई हैं? क्या सोशल मीडिया पर महिलाएं अपने द्वारा लिखे गये विमर्श, मुद्दों के जरिये वे अपनी एक दुनिया, अपना एक इतिहास लिखती हुई नजर आ रही हैं? पुरुषों के द्वारा लगातार महिला विरोधी टिप्पणी, चुटकुले अभद्र भाषा का इस्तेमाल फेसबुक पर कब्जे की लड़ाई को भी दर्शाता है?

समाज में सत्ता का स्वरूप ही हिंसक है जो समाज में समानता और असमानता के बीच में एक गहरी खाई बना के रखता है और जब जेंडर इक्वलिटी की बात हो तो वहां सीधे सत्ता को चोट पहुंचती है। इसी तरह सोसल मीडिया जो मुख्यधारा की दुनिया को एक दूसरे से जोड़कर रखने में कामयाब हुई है। इसमें महिलाओं की क्या भूमिका है, क्या हिस्सेदारी है? महिलाएं सोशल मीडिया में अपने आप को किस तरह से देखती हैं इनकी कितनी प्रतिशत मीडिया में उपस्थिति है यह शोध का विषय है। 

यहाँ सोशल मीडिया पर भी कब्जे की लड़ाई चल रही है वो इसलिये कि यहाँ महिलाएं बिना किसी रोक-टोक के मुखर हुई हैं, जहाँ सत्ता चाह कर भी कुछ कर नहीं सकती है भारत में महिलाओं की राजनीतिक सहभागिता में प्रतिनिधित्व का जिस तरह से सवाल है उसी तरह से सोशल मीडिया पर महिला भूमिका पर भी सवाल होने चाहिए ऐसा मुझे लगता है। 

सोशल मीडिया पर उन तमाम महिलाओं के लिखे गये अनुभव ही नारीवादी विमर्श है जिसमें सवर्ण, दलित, आदिवासी और मुस्लिम महिलाएं सब शामिल है, इसे अब साइबर फेमिनिज्म भी कहा जा रहा है। भारत एक सौ पच्चीस करोड़ जनसंख्या वाला देश है इसमें कितनी प्रतिशत महिलाएं सोशल मीडिया पर लिख रही हैं? अगर वे लिख रहीं हैं यह अपने आप में ही बहुत बड़ी बात है। 

जो महिलाएं अपनी बात को अपने घर में, अपने दोस्तों में साझा नही कर पा रही थी, अपनी बात को मंच के जरिये लोगों तक नही पहुंचा पा रही थीं आज वो महिलाएं अपनी बात को बड़ी मजबूती से सोशल मीडिया पर लिख सकतीं हैं। सोशल मीडिया पर महिलाएं अपनी बातों के माध्यम से अपने अस्तित्व के सन्दर्भ में बात करती हैं और स्त्री के आजादी के नए मायनों के दिशा में नई चुनौतियों पर भी बात करतीं हैं। 

वे क्या पहनेंगीं, क्या खाएंगी, किस तरह के दोस्त होंगे यह सब उनका फैसला होता है। चाहे वह तीन तलाक हो, बलात्कार हो, भ्रूणहत्या हो, एसिड अटैक, स्टोकिंग हो यौनिक हिंसा हो या राजनीति में महिला की भूमिका। आदिवासी अल्पसंख्यक एवं एल जी बी टी, जैसे तमाम महिला मुद्दों पर अपनी पूरी बातों को बेहतर तरीके रखतीं हैं। वहीं इन महिलाओं को ज्यादा से ज्यादा पढ़ा भी जाता है। महिलाओं के अन्दर जो वर्षों का गुस्सा, प्रतिरोध है वो ऐसे फूट कर बाहर आ जायेगा कभी सोचा भी नही होगा किसी ने। 

सोशल मीडिया पर महिलाएं अपनी कास्ट चाहे वह दलित हो आदिवासी हों, मुस्लिम हो, वह खुले तौर पर स्वीकार करती हैं।  मैं यहाँ उन महिलाओं की बात कर रही हूँ जो सोशल मीडिया पर अपनी रियल आई डी के साथ मौजूद हैं। महिलाओं की पोस्ट के समर्थन में महिलाओं के बीच एक यूनिटी बनती भी नजर आती है जिससे मुख्यधारा के लोगों को एक मैसेज जाता है।             

पितृसत्तात्मक समाज के द्वारा महिलाओं के तर्क को, तथ्य को खारिज करने का तरीका जिस तरह से अपनाया जाता है, यहाँ उसका मैं एक उदाहरण देना चाहूँगी। फेसबुक पर पुरुष मित्रों द्वारा पहले मैसेज करना फिर आडियो-विडियो करना, पोर्न साईट को मैसेज में भेजना, पोर्न का स्क्रीन सॉर्ट भेजना, रिप्लाई नही करने पर गंदी गाली देना, रंडी या वेश्या कहना तो आम है। 

इस तरह की घटनाओं में वे सब तरह की महिलाएं शामिल हैं। खासकर फेसबुक पर सक्रिय महिलाएं जो सेक्स, जेंडर, देश, देह, राष्ट्र, धर्म, आर्थिक, राजनीतिक, सामाजिक, सांस्कृतिक परिवर्तन की बात करती हैं, अगर वे महिला पत्रकार हों तो उन्हें खबररंडी कहा जाता है। अगर वे महिला संगठन की एक्टिविस्ट हों तो उन्हें सेक्सवर्कर, नक्सली कह कर टारगेट किया जाता है । 

पुरुष मित्रों द्वारा ऐसे लाजिक या सलाह दिये जातें हैं कि आप बड़ी सेंसिटिव, कोमल, सुन्दर वस्तु हैं जिसे सिर्फ फेसबुक पर अपने छवि को सुंदर बना के रखने की जरुरत है। फेसबुक पर सांवली लड़कियों को नस्लीय टिप्पणी का भी सामना करना पड़ता है। फेसबुक पर सेक्सुअल फेंटेसी भी है। 
लोग पहले प्रोफाइल को चेक करते हैं। उनकी फोटोज को चेक करते हैं। पोस्ट को पढ़ने के बाद इनबॉक्स करते हैं। यह लोग महिला के पोस्ट को सामान्य तरीके से नही लेते हैं ज्यादातर लोग अपने मर्दवादी सोच के चलते इसे चुनौती की तरह लेते हैं।   

उनका सवाल देखिये क्या होता है। आप अपनी रियल उम्र क्यों नही डालती हैं और उसी उम्र की तस्वीर क्यों नहीं लगाती हैं। आप शादी-शुदा हैं तो वो भी मेंसन क्यों नहीं करती हैं और तस्वीर टेढ़ी नही एक दम सीधी सामने से लगी होनी चाहिए ताकि वह आप की पहचान अच्छे से कर सके। आप वर्जिन हैं या नही। यह एक सर्किल है जो चलता रहता है जो रुकने का नाम नही लेता है। यह सब किसी एक महिला का अनुभव समझने की कत्तई गलती न करियेगा । 

सोशल मीडिया पर राजनीतिक पार्टियों के लोग भी बहुत सक्रिय हैं चाहे वह भाजपा हो, कांग्रेस हो, सपा हो या बहुजन हो या लेफ्ट हो यह सब लोग एक दूसरे की आलोचना करते नजर आ जायेगें। इनकी कभी भी किसी भी मुद्दे को लेकर यूनिटी नजर नहीं आएगी। वहीं महिलाओं की यूनिटी नजर आती है एक बहुजन, लेफ्ट प्रोग्रेसिव वर्ग भी है जो जेंडर सेंसटाईजेसन को लेकर बहुत ढिंढोरा पीटता है और इस तरह के मुद्दों  पर पोस्ट लिखते रहता है और हम उनके पोस्ट, लेख, कविता से प्रभावित हो कर अपना नम्बर दे दिए या ले लिए तो आप सबसे बड़ी गलती कर चुकी हैं। 

शुरु में तो लगेगा कि सोशल मीडिया इतने अच्छे दोस्त दे सकता है बाद में आप को पता चलेगा कि ये लोग भी महिलाओं को एक वस्तु के रूप में ही अभी भी देखते हैं। इनकी बात इस तरह से शुरु होती है - आप कितनी उन्मुक्त हैं, अब तक कितने प्रेम, सेक्स कर चुकीं हैं? आप मैरिड होकर भी इतर सम्बन्ध चला सकतीं हैं। हम उन्मुक्त हैं, प्रोग्रेसिव हैं, आप इससे जुड़े हुए हर मसले पर हमसे बात कर सकतीं हैं। शुरुआत में आप समझ ही नही पायेंगी कि आप सहज है या नहीं, न चाहते हुए भी जबरजस्ती उसी देह सेक्स पर बात करना भी हो जाता है। 

जब हमारा सवाल यह होता है कि क्या आप इस तरह का स्पेस अपनी माँ ,बहन ,बेटी ,पत्नी को देतें हैं ? तब आप को ऊधर से वही जीरो वाला रिप्लाई मिलेगा। इसके बाद इस तरह की बात जब आप सार्वजानिक करते हैं तो अपने ही लोग सीधा यही जवाब देते हैं कि आप फेसबुक पर इस तरह के मित्रों को नम्बर ही क्यों देती हैं। उन्हें आप ब्लॉक क्यों नही कर देती हैं। 

इस पर आप का क्या जवाब होगा ? सवाल यह नहीं है कि हमें ऐसे लोगों की पहचान की जरुरत है। सवाल यह भी है कि यह किस तरह की मानसिकता है जो प्रोग्रेसिव लोगों में भी भरा पड़ा है। जिसे हमें समझने और अपने आपमें सुधार करने की भी जरूरत है। यहा पिंक फिल्म का एक डायलॉग याद आता है कि कोई भी महिला किसी पुरुष के साथ शराब पीती है तो इसका मतलब यह नही है कि वो आप से सेक्स के लिये अवलेबल है। 

उसी तरह फेसबुक पर 2 बजे रात को ऑनलाइन होने का मतलब रूढ़ मानसिकता वाले लोग यही निकालते हैं कि अगर आप 2 बजे ऑनलाइन हो सकती हैं तो आप हम से चैट क्यों नही कर सकती हैं यहां हमें इस तरह से भी यह समझने की जरूरत है की ये लोग आधी रात को सड़क पर घूम सकतें है और हम आधी रात को सोसल मीडिया पर ऑनलाइन भी नही हो सकते हैं कहने का मतलब बस इतना है की जहां सोसल मीडिया पर महिलायें जितना आजाद हुई है उससे कही ज्यादा उन्हें सोसल मीडिया से खदेड़ने की मुहीम चलाई जा रही है ।

पितृसत्तात्मक समाज ने जिस तरह से कैमरे में व्यूटी का आप्शन दिया उसी तरह से महिलाएं अपने आप को वस्तु के रूप में सोसल मिडिया पर खुद को परोसते भी रही है वही एक ऐसा महिलाओं का धड़ा भी है जो अपनी लेखनी, कविता के जरिये अपने अस्तित्व को बनाये रखने के लिये लगातार संघर्षरत है ।

 सोशल मीडिया पर एक बहस चल रही है सोनम गुप्ता बेवफा है जिसे बीबीसी ने भी कवर किया है इसे समाज में हास्य के रूप मे लिया जा रहा है यह जेंडर से जुड़ा हुआ एक सवाल भी है जिसे हमे समझने की जरूरत भी है यही कोई पुरुष के बारे में ऐसा लिखा होता तो यह इतना प्रसारित नहीं होता जितना सोनम गुप्ता को फेमस कहे या बदनाम कहे किया गया है जहाँ लोग नोट बंदी के खिलाफ लामबंद हो रहें हैं तमाम तकलीफों के साथ बैंकों के कतार मे खड़े हैं वही इस तरह की बात नोट पर लिख कर एक हास्य मे तब्दील किया जा रहा है अघोषित आर्थिक आपातकाल में जो गुस्सा सत्ता के खिलाफ होना चाहिए था जिसे हंसी के रूप मे सोशल मीडिया पर वायरल किया जा रहा है जो कितना महिला विरोधी व्यंग है। 

कवी बासवन्ना जी की यह कविता है जो बार बार सोचने के लिए मजबूर करती है एक औरत को की वह अपने अस्तित्व को बनाये रखे।
“ यहां देखो मेरे हम सफर 
मैंने यहा पुरुषों के कपड़े धारण किये हुए हैं ,सिर्फ तुम्हारे लिए 
कभी मैं पुरुष हूँ , कभी मै स्त्री ”

लेखिका- सुशीला दिल्ली विश्वविद्यालय इतिहास विभाग की शोध-छात्रा हैं, यह उनके निजी विचार हैं। नेशनल दस्तक से साभार। 
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