नोटबंदी कहीं देश को फिर से गुलाम बनाने की साजिश तो नही?

नोटबंदी कहीं देश को फिर से गुलाम बनाने की साजिश तो नही?


अमन पठान
रात रो-रो के गुज़ारी हमने, देख ली यार की यारी हमने।
वो समझे ही नही न समझना चाहा, कह दी दिल की बात सारी हमने।।
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इन पंक्तियों का अर्थ सिर्फ इतना है कि आपको नोटबंदी के पीछे का सच बताया जाये। नोटबंदी के फैसले की तरह आप इस लेख का समर्थन करें या विरोध? ये आपकी सोच पर निर्भर करता है। वही लोग पीएम मोदी के फैसले को सही बताकर भाजपा सरकार का समर्थन कर रहे हैं। जो अपने दुःख से ज्यादा दूसरों से सुख से परेशान रहते हैं। उनकी नजर में नोटबंदी से पूंजीपति बर्बाद हो जायेंगे। उनका ऐसा सोचना सरासर गलत है। क्योंकि नोटबंदी से पूरा देश बर्बाद होगा।
पीएम नरेंद्र मोदी ने बीते आठ नबंवर को कालेधन पर सर्जिकल स्ट्राइक की थी। नोटबंदी के 20 दिनों में करीब आठ लाख करोड़ रूपये देश भर की बैंकों में जमा हुए, लेकिन कालाधन बाहर नही आया तो मोदी सरकार ने कालेधन वालों 50-50 का गोल्डन ऑफर दिया। उसके बाबजूद कालाधन बाहर नही निकला तो फिर मोदी सरकार ने नई चाल चली और भाजपा राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह को आयकर आयुक्त की उपाधि देते हुए बीजेपी विधायक, सांसदों को अपनों खातों का ब्यौरा देने के लिए आदेशित किया। इससे विपक्षी विधायक, सांसद जनता की नजर में खुद को ईमानदार साबित करने की कवायद में अपने खातों का ब्यौरा सार्वजनिक कर दें।
अब मैं असल मुद्दे पर आता हूँ। मोदी सरकार की तमाम कोशिशों के बाबजूद कालाधन बाहर नही आया। मैं कोई विधिज्ञाता या अर्थ शास्त्री नही हूँ। एक बुद्धिजीवी आम नागरिक होने और भारतीय संविधान के अनुच्छेद 19 के तहत स्वतंत्रता अधिकार से ये बात कह रहा हूँ कि नोटबंदी से न सरकार को कोई फायदा होगा और न आम जनता को? क्योंकि पीएम मोदी के फैसले के बाद 500-1000 के नोट कागज के टुकड़े हो गए हैं। 20 दिन में जमा हुए करीब आठ लाख करोड़ रुपयों का सरकार भी कोई उपयोग नही कर पायेगी। ये रुपया न तो किसी निर्माण कार्य और न किसी योजना में लगाया जा सकता है।
क्योंकि 500-1000 के नोट तो अब कागज के टुकड़े हैं। सरकार को जनता के बैंकों में जमा पैसों को नए नोट छापकर वापस करने होंगे। आठ लाख करोड़ रुपया छापने में सरकार को काफी रुपया खर्ज करना पड़ेगा। चलिए मान लेते हैं कि नोटबंदी और मोदी सरकार की कोशिशों से कालाधन बाहर आ भी जाता है तो उससे सरकार और जनता को क्या फायदा होगा। 500-1000 के नोट तो कागज के टुकड़े हो चुके हैं। वह नोट अमान्य हैं और पुराने नोटों को सरकार भी कहीं खर्ज नही कर पायेगी। नोटबंदी का फलसफा कुछ समझ में नही आ रहा है।
नोटबंदी की वजह से सरकार को पूरा सिस्टम सुधारने में करीब चार से पांच लाख रूपये खर्ज करने होंगे और बैंकों में जमा जनता के पैसों को वापस करने के लिये नए नोट छापने होंगे। आपने कभी सोचा है कि इतना सारा रुपया छापने के लिए सरकार को कितने लाख करोड़ रूपये खर्ज करने पड़ेंगे। अगर सरकार कोई नई योजना लागू करती है। उसका सीधा बोझ आम जनता के कांधो पर पड़ता है। नोटबंदी की योजना हजारों नही लाखों करोड़ रूपये की है। अब आप एक बार खुद सोच लो कि आपके कांधो पर कितना बोझ पड़ने वाला है। इस नोटबंदी से गर्भ में पल रहा बच्चा पैदा होते ही सरकार का कर्जदार हो जायेगा।
पीएम मोदी ने गरीबों तक रसोई गैस पहुँचाने की कवायद में संपन्न लोगों से रसोई गैस सब्सिडी छुड़वाई। अब गरीबों को 15 लाख रूपये देने के लिए हर भारतीय नागरिक की जमा पूंजी बैंकों में जमा करवा दी। जब पुराने नोट चलेंगे ही नही तो गरीब जनता के खातों में 15 लाख रूपये कैसे आ जायेंगे। पीएम मोदी नोटबंदी किये बिना भी नए नोट छपवाकर जनता के खातों में डलवा सकते है। नोटबंदी करने का आखिर क्या कारण है?
नोटबंदी के बजाय विधायक, सांसदों के घर इनकम टैक्स टीम से छापेमारी और उनके खाते सीज कराकर जांच कराई गई होती और उनसे पूंछा जाता कि उन्होंने इतना पैसा कैसे कमाया तो शायद कालाधन बाहर आ जाता और पुराने नोट सरकार के काम आ जाते। अगर अब सरकार कालाधन पकड़ भी लेती है तो उससे क्या फायदा होगा? पकड़ा गया कालाधन तो कागज ही होगा? कालेधन की सर्जिकल स्ट्राइक के बाद जब्त हुए नोटों को क्या सरकार की फिर से चलाने की योजना थी?
अगर पुराने नोटों को फिर से चलाने का कोई इरादा नही था तो जनता की जमा पूंजी के साथ सरकार के खजाने के भी 500-1000 के नोट कागज के टुकड़े हो गए। सबसे अहम सवाल जिस पर आपने गौर नही किया होगा। देश में काफी प्राइवेट बैंक हैं उनका भी पैसा रद्दी हो गया। अब सरकार को जनता, प्राइवेट बैंकों और अपने लिए इतना पैसा छापना होगा जिससे सारी व्यवस्थाएं दुरूस्त हो जाएं। एक सवाल ये भी है कि सरकार को 500 और 2000 के नए नोट छापने के लिए कागज भी खरीदना होगा। अगर सरकार 50 और 100 के नोट से नए नोट छापने के लिए कागज खरीदती है तो देश में 50 और 100 के नोट की कमी से हाहाकार मच जायेगा।
सरकार इस समस्या पर गौर करते हुए विदेशों से कर्ज जरूर लेगी और कोई भी बिना स्वार्थ के कर्ज नही देता है। पीएम मोदी की देश में ईस्ट इंडिया जैसी कंपनी की स्थापना की मंशा तो नही है। अगर ईस्ट इंडिया जैसी कंपनी की स्थापना होती है तो अच्छे दिनों की आस लिए लोगों के बुरे दिन आ जायेंगे। ये नोटबंदी अगली सरकार के लिए मुसीबत बन जायेगी।


(लेखक अमन पठान वरिष्ठ पत्रकार व केयर ऑफ़ मीडिया के संपादक हैं।  लेखक के विचार पूर्णत: निजी हैं, इस लेख को लेकर अथवा इससे असहमति के विचारों का भी UPUKLive.com स्‍वागत करता है। इस लेख से जुड़े सभी दावे या आपत्ति के लिए सिर्फ लेखक ही जिम्मेदार है। आप लेख के साथ अपना संक्षिप्‍त परिचय और फोटो भी upuklive@gmail.com भेज सकते हैं।)
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