ट्रिपल तलाक और बहुविवाह: कल्पित कथा बनाम तथ्य

ट्रिपल तलाक और बहुविवाह: कल्पित कथा बनाम तथ्य

. मुहममाद बुराहनुद्दीन क़ासमी

भारत की संविधान का धारा 25 मौलिक अधिकारों से संबंधित है जो इस प्रकार से दर्ज है: "... सभी व्यक्तियों को समान रूप से अंतरात्मा की स्वतंत्रता हासिल है और स्वतंत्रता से धर्म स्वीकार करने, उसपर अभ्यास करने और धर्म के प्रचार करने का समान अधिकार हासिल है।" (भारत का संविधान (एक जुलाई 2013 तक संशोधित), पृष्ठ 52, मुद्रित एन सी पी यू एल, मानव संसाधन विकास मंत्रालय)

संविधान की धारा 44 जो कि एक अनुदेश सिद्धांत (Directive Principle) है, उसके शब्द इस तरह हैं: "राज्य यह कोशिश करेगी के भारत के पूरे क्षेत्र में नागरिकों के लिए समान नागरिक संहिता की गारंटी हो।" (भारत का संविधान, पृष्ठ 62)
सीधी सी बात यह है कि कोई अनुदेश सिद्धांत (Directive Principle) जिसकी स्थिति एक सलाह या वैकल्पिक की है वो किसी भी नागरिक के मौलिक अधिकारों को खत्म नहीं कर सकता। मुस्लिम पर्सनल लॉ में बदलाव लाने की बाहरी प्रयासों को हमेशा भारतीय मुसलमानों ने आम तौर पर धर्म और धार्मिक आदेशों में हस्तक्षेप माना है। इसलिए इस तरह की तमाम कोशिशें संविधान के माध्यम से दिए गए मौलिक अधिकारों का उल्लंघन है।
हाल ही में भाजपा सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में जो हलफनामा दायर करके मुस्लिम पर्सनल ला से ट्रिपल तलाक और बहुविवाह को खत्म करने की मांग की है वह निश्चित रूप से अनुचित, अनावश्यक और एक चुनावी रणनीति है। इसी तरह से ला कमीशन ऑफ इंडिया की ओर से जारी प्रश्नावली भी असंतोषजनक  और जानिबदारना है जिसको अल्पसंख्यक और दलित एक साजिश का हिस्सा मानते हैं, कि समान नागरिक कार्ड के पर्दे में ब्राह्मण कानून थोपने और इखतिलाफ का बीज बोने के लिए ये साजिश रची जा रही है।

भारत एक धर्मनिरपेक्ष देश है। किसी विशेष धर्म या अक्सर वर्ग के धर्म को सरकारी धर्म की हैसियत नहीं दी गई है। संविधान की धारा 29 और 30 ने धार्मिक और भाषाई अल्पसंख्यकों को अपनी पसंद के शैक्षिक संस्थान स्थापित करने और चलाने का पूरा अधिकार दिया है।
ट्रिपल तलाक और मुस्लिम समाज:
सरकार और कुछ मीडिया वाले ट्रिपल तलाक और बहुविवाह की समस्या को कुछ इस तरह पेश कर रहे हैं मानो ट्रिपल तलाक और बहुविवाह केवल मुसलमानों के बीच आम है, जबकि तथ्य काफी अलग कहानी सुनाते हैं।
जनगणना 2011 के आंकड़ों के अनुसार भारत की जुमला तलाकशुदा महिलाओं में 68 प्रतिशत औरतें हिंदू हैं, जबकि मुस्लिम तलाकशुदा महिलाओं की संख्या 23.3 प्रतिशत है। जनगणना 2011 से ये भी पता चलता है कि 1000 में से 5.5 हिंदू जोड़े अलगा हो जाते हैं, उसमें वे महिलाएं भी शामिल हैं जिन्हें उनके पतियों ने लटका रखा है। इस सूची में एक नाम वर्त्तमान प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी की पत्नी श्रीमती जसोदा बेन का भी है। इसलिए कानूनी तौर पर तलाक पाई हुई महिलाओं 1.8 की संख्या के साथ अलाहिदगी की शिकार महिलाओं को भी जोड़ लिया जाए तो हिंदुओं के बीच ऐसी महिलाओं की संख्या 1000 में 7.3 हो जाती है। इस तथ्य से यह बात सामने आती है कि हिंदुओं के बीच तलाक या अलाहिदगी की दर मुसलमानों के बीच तलाक के दर से बहुत अधिक है जो कि जनगणना 2011 के अनुसार 1000 में केवल 5.63 है, जबकि मुसलमानों के बीच अलाहिदगी या लटका रखने के मामले बहुत ही कम मिलते हैं, क्योंकि उनके यहां तलाक या बदनाम- ज़माना ट्रिपल तलाक के प्रारूप में पति पत्नी के अलग होने का एक तरीका मौजूद है।
लेकिन दुर्भाग्य यह है कि भारतीय मीडिया अपनी टी आर पी बढ़ाने के जुनून में मामलात को गंभीर बनाने के लिए अफसानों के पीछे भागने का आदी है और इस तरह की बातें को "जिहादियों का इस्लाम" बनाम "वास्तविक इस्लाम" के रूप में प्रस्तुत करते हैं।
यह एक तथ्य है कि इस्लाम में एक मजलिस में ट्रिपल तलाक निषेध है और उसकी बहुत निंदा की गई है। इस्लाम तो ट्रिपल तलाक के लिये प्रोत्साहित करता है और ही बहुविवाह के लिये, और यह चीज़ें मुसलमानों में आम भी नहीं हैं। सर्वेक्षण के अनुसार बहुत कम लोग ही ट्रिपल तलाक का रास्ता अपनाते हैं और वह भी अज्ञानता के कारण। मगर इसके बावजूद अगर कोई तीन तलाक देता है या किसी का तीन तलाक देना साबित हो जाता है तो यह बतौर पति पत्नी के इस जोड़ी के जीवन पर जरूर प्रभावित होगा।
कुछ आज़ाद ख्याल तथाकथित मुस्लिम जिनका इस्लाम से संबंध उनके अरबी या इस्लामी नामों को छोड़कर कुछ भी नहीं है, बड़ी शक्ति के साथ यह मुग़ालता फैला रहे हैं कि ट्रिपल तलाक जैसी कोई चीज़ इस्लाम में सिरे से है ही नहीं, बल्कि मुल्लाओं की अपनी आविष्कार है। लेकिन हमारे सामने क़ुरान की आयत मौजूद है जिसमें कहा गया है:
"तलाक दो हैं। (इसके बाद पति के लिए दो ही रास्ते हैं) या तो नियम के अनुसार पत्नी को रोक रखे (यानी वापस कर ले) या अच्छे ढंग से छोड़ दे।" (सूरतुल बक़रा: 229)
इस आयत से स्पष्ट रूप से पता चलता है कि दो तलाक तक पति को अधिकार है कि अपनी पत्नी को वापस कर ले या प्रतीक्षा अवधि के पूरा होने तक छोड़ रखे और फिर अच्छे ढंग से उसे मुक्त कर दे। आयात के अंत तक क़ुरान ने महिलाओं के अधिकारों की पूर्ति के संबंध में अल्लाह से डरने और रिश्ते की डोर को मजबूत करने के महत्व का वर्णन किया है। इसके बाद की आयत स्पष्ट रूप से तीसरे तलाक का वर्णन करती है।  कुरान कहता है:
"फिर अगर पति ने (तीसरी) तलाक दे दी तो वह तलाकशुदा महिला उसके लिए तब तक वैध नहीं होगी जब तक वह किसी और पति से निकाह कर ले। यदि दुसरा पति उसे तलाक दे देता है (या मर जाता है) तो इस महिला और उसके पहले पति के लिए एक दूसरे से रुजू करने मैं कोई हर्ज नहीं है, अगर वे समझते हैं कि वे अल्लाह के ज़रिए स्थापित सीमाओं को बाकी रख सकेंगे। यह अल्लाह की सीमाएं हैं जो वे जानकारों पर स्पष्ट करता है। " (सूरतुल बक़रा: 230)
मैं ने अपने एक पिछले लेख "तलाक तलाक तलाक: एक अपराध" में विस्तार के साथ यह स्पष्ट किया है की तीन तलाक कैसे नबी अकरम (...) के ज़माने से ही लागू मानी जाती रही है। गो कि नबी (...) ने अपने कुछ साथियों के माध्यम से तलाक के दुरुपयोग और इस्लाम की भावना का पालन किए जाने की वजह से नाराजगी व्यक्त किया, फिरभी उन्होंने एक से अधिक अवसर पर एक सभा की तीन तलाक के बाद पति-पत्नी के बीच अलाहिदगी का फैसला सुनाया।
पहले खलीफा अबू बकर ( ) की खिलाफ़त में इसी पर अमल होता रहा। बाद में द्वितीय खलीफा उम्र ( ) ने हालांकि एक बैठक में तीन तलाक देने वाले पर दंड लगाया, लेकिन उन्होंने इस तरह के तलाक को लागू जरूर कराया। इसी तरह से बाद के ज़माने के ख़लीफ़ा, इमाम, मोहद्देसीन, न्यायाधीश, चारो मसलक--हनफ़ी, शाफई, मालिकि और हंबली-- का आज तक यही फेसला है।
जो लोग खाली ड्रम की तरह वातावरण में झूठ का राग अलापते रहते हैं वे वास्तव में फितना परवर हैं, जो इस्लामी अध्ययन और उसके दीवानी और आपराधिक कानूनों से बिल्कुल बे खबर हैं। ऐसे लोग वैश्विक स्तर पर कुछ मीडिया हाउसस के लिए उपकरण का काम कर रहे हैं। इसी वजह से मुस्लिम जनता ने हमेशा उन्हें नकार दिया है।
यहां यह स्पष्ट कर देना भी उचित प्रतीत होता है कि कुछ चिल्लाने वाले टी वि होस्ट और कट्टरपंथी "भक्त" सहित कानून मंत्रालय यह बात बड़ी जोर-शोर से कहते रहे हैं कि कई मुस्लिम देशों ने ट्रिपल तलाक पर पाबंदी लगा रखी है। यह एक झूठ और फरेब है। ट्रिपल तलाक को मुसलमान ग्रुप या अकेले किसी भी रूप मैं प्रतिबंधित कर ही नहीं सकते। मुस्लिम विद्वानों के बीच मतभेद सिर्फ इस बात का है कि एक सभा में दिए गए तीन तलाक तीन ही मानी जाएगी या सिर्फ एक। कुछ मुस्लिम देशों में कुछ शर्तों के साथ तीन तलाक सिर्फ एक तलाक माना गया है, जबकि अधिकांश देशों ने इसके उपयोग को अवैध माना है, लेकिन इसे लागू जरूर माना है। सऊदी अरब के संविधान के शब्द इस तरह हैं: " ट्रिपल तलाक अवैध, लेकिन लागू है।"
सऊदी अरब के बड़े बड़े उलमा के एक सम्मेलन में इस मुद्दे को पेश किया गया और पूरी विचार के बाद उन्होंने यह फैसला किया कि एक मजलिस में तीन तलाक देने से कुरान और हदीस की रोशनी में तीन तलाकें स्थित होंगी। 
[Http://islamtoday.net/bluetooth/artshow-32-6230.htm]
पाकिस्तानी संविधान के शब्द इस प्रकार हैं: तीन तलाक देना परम और लागू हैं यहां तक ​​कि दूसरी शादी कर ली जाए। [Law of Divorce and Khula in Pakistan, page: 8: by Barrister Ali Shaikh]
अन्य देशों के मुसलमान चाहे वह बहुमत में हों या अल्पसंख्यक कैसे इस्लाम का पालन कर रहे हैं यह बात भारतीय मुसलमानों के लिए कोई मायने नहीं रखती। भारतीय मुसलमान और उनके उलमा संतुलित इस्लाम के पालन करने को लेकर पूरी दुनिया में एक उदाहरण की हैसियत रखते हैं। यहां तक ​​कि कुछ भारतीय उलमा सदियों तक अधिकांश देशों के लिए प्रामाणिक धार्मिक आदर्श रह चुके हैं। उन्होंने अपने पीछे इस्लामिक पुस्तकों का एक बड़ा खजाना छोड़ा है जिससे दुनिया आज तक फ़ायदा उठा रही है। तो शरई सीमाओं के भीतर उनकी आज भी वही मुक्त स्थिति रहनी चाहिए जो अतीत में रह चुकी है।
तीन तलाक का उपयोग बेशक कानून का दुखद उपयोग है। कुछ मुसलमान मर्द इस कानूनी प्रणाली का दुरुपयोग कर रहे हैं। उन्हें इसके लिए जवाबदह बनाना चाहिए और दुरुपयोग को रोकने के लिये उन्हें सजा भी दी जानी चाहिए। इसी तरह से जो लोग महिलाओं के साथ अत्याचार और दुर्व्यवहार से पेश आते हैं या तलाक दिए बिना अपनी पत्नी से अलग हो जाते हैं और परिणाम के रूप में उन्हें पूरे जीवन मानसिक और शारीरिक पीड़ा से पीड़ित रखते हैं, ऐसे लोगों के लिए भी कोई सजा प्रस्ताव की जानी चाहिए। मगर तीन तलाक पर प्रतिबंध लगाना या मुस्लिम पर्सनल लॉ में बदलाव लाना समस्या का समाधान नहीं है। पुरुषों को महिलाओं के अधिकारों और उनके सम्मान के संबंध में संवेदनशील बनाना इस मसइले का सबसे अच्छा उपाय है।
इस्लाम बहुविवाह को प्रोत्साहित नहीं करता
इस्लाम कठोर शर्तों के साथ बहुविवाह की अनुमति देता है, जिनका पूरा करना बेहद मुश्किल है। यही कारण है कि उपमहाद्वीप भारत के मुस्लिम समाज में बहुविवाह का रिवाज आम नहीं है। गिने चुने लोग ही एक से अधिक पत्नियाँ रखते हैं। कभी कभी यह काम पहली पत्नी की इच्छा पर या कम से काम आपसी सहमति से भी होता है।
कुछ लोग एक से अधिक शादी जरूरत की वजह से करते हैं, जैसे कि पहली पत्नी किसी लाइलाज बीमारी से पीड़ित हो या किसी को संतान की इच्छा हो, जबकि कुछ लोग गलत उद्देश्य से भी कई शादियाँ करते हैं, लेकिन ऐसे लोगों की संख्या बेहद कम है। अगर कुछ अन्य महिलाओं से शादी करने के बाद पहली पत्नी पर अत्याचार करते हैं तो यह उनका निजी अपराध समझा जाएगा, इसके लिए कानून को दोषी नहीं ठहराया जा सकता।
यह बात भी ध्यान देने के योग्य है कि जिन लोगों को संवैधानिक रूप से एक से अधिक शादी करने की अनुमति नहीं है वे बहुविवाह के संबंध में मुसलमानों से कहीं आगे हैं। कितने भारतीय ने एक से ज़ियादा विवाह किया है? इस संबंध में आज के वक़्त मैं  सहीह आंकड़े मिलना मुश्किल है, इस का मुख्य कारण यह है कि 1961 के जनगणना बाद से धर्म या समुदाय के आधार पर शादी के मामलों पर विचार नहीं किया गया है। लेकिन मौजूदा सर्वेक्षण से इतना ज़रूर मालूम होता है कि बहुविवाह की प्रथा सबसे कम मुसलमानों में है। मुस्लिम समाज मैं 5.7 लोग बहुविवाह करते हैं। हिंदुओं के बीच बहुविवाह की घटनाओं की दर इससे अधिक यानी 5.8 है, हालांकि अन्य मज़हब जैसे बौद्ध और जैन धर्मों से संबंधित व्यक्तियों के बीच का अनुपात और भी अधिक है। 7.9 प्रतिशत बौद्ध और 6.7 प्रतिशत जैन एक से अधिक पत्नियाँ रखते हैं। और सबसे आगे आदिवासी हैं जिनमें 15.25 प्रतिशत लोग एक से अधिक पत्नियाँ रखते हैं।
ध्यान देने की बात यह है कि संविधान की धारा 25 सिख,  जैन और बौद्ध को हिंदू धर्म का ही हिस्सा मानती है, हालांकि ये धर्म वाले संवैधानिक रूप में अपने स्थायी पहचान के लिए मांग कर रहे हैं। संविधान की धारा 25 के वाक्यांश (2) उप वाक्यांश () की द्वितीय व्याख्या देखिए: "हिंदुओं की यह व्याख्या की जाएगी कि इसमें सिख, जैन और  बुद्ध धर्म के मानने वाले शामिल हैं।" इसलिए यदि आप संविधान द्वारा की गई हिंदू धर्म की परिभाषा को सामने रखकर विचार करते हैं तो हिंदुओं में बहुविवाह अनुपात बढ़कर 20.4 हो जाता है, इस मैं सिख शामिल नहीं हैं, क्योंकि हमारे पास उनके संबंध में आंकड़े मौजूद नहीं हैं।
अब मुख्य मुद्दा यह खुलकर सामने आता है कि 1961 के जनगणना आंकड़ों के अनुसार 5.7 प्रतिशत मुसलमान और 20.4 प्रतिशत हिंदू एक से अधिक पत्नियाँ रखते हैं।
भारत सरकार और कुछ महिला आंदोलन कारियों के दावे कि विपरीत बहुविवाह एक गैर इस्लामी प्रक्रिया है और क़ुरान उसकी अनुमति नहीं देता, क़ुरान की एक आयत का अनुवाद पेश है:
"और अगर आप को इस बात का डर है कि अनाथ लड़कियों के साथ न्याय कर सकोगे तो उनके इलावा जो औरतें तुम्हें पसंद हूँ दो दो, या तीन, या चार, उनसे निकाह कर लो। और अगर इस बात का अंदेशा हो कि (सब महिलाओं से) समान व्यवहार कर सकोगे तो एक महिला (से विवाह करो)" (सूरह निसा: 3)
सारांश यह है कि बहुविवाह एक शर्त वाली विकल्प है, लेकिन इस्लाम ने अनुमति दी है।
मालेगांव महाराष्ट्र में ummid.com के पत्रकारों के एक दल ने मुसलमानों के बीच बहुविवाह की घटनाओं के संबंध में वास्तविक आंकड़े पता करने के लिए जमीनी स्तर पर एक सर्वेक्षण किया। माले गांव शहर में मुसलमान बहुमत में हैं, जो कुल 7 लाख आबादी का 78.95 प्रतिशत हैं। ये सर्वेक्षण रिपोर्ट कुछ इस तरह है:
"मोदी सरकार और कुछ महिला कार्यकर्ताओं के माध्यम से बहुविवाह पर प्रतिबंध की मांग की याचिका दायर किए जाने के बाद इस विषय पर गरम बहस के दौरान ummid.com ने एक त्वरित सर्वेक्षण किया जिसके अनुसार पूरे शहर में जहां मुसलमान बड़ी संख्या में बसे हैं केवल दो पुरुष ऐसे मिले जिनके पास तीन पत्नियां हैं।"
रिपोर्ट में आगे कहा गया है: "पूरे माले गांव शहर में जहां 5 लाख मुसलमान रहते हैं, केवल 151 पुरुषों के पास 2 पत्नियां, जबकि किसी के पास भी 4 पत्नियां नहीं हैं।"
माले गांव में किए गए ताजा सर्वेक्षण और 1961 के जनगणना आंकड़ों से यह बात बिल्कुल स्पष्ट है कि बहुविवाह पर प्रतिबंध लगाने से कोई अंतर नहीं होगा, और बहुविवाह का रिवाज तो समाप्त होगा और ही महिलाओं पर अत्याचार का सिलसिला समाप्त होगा। इसलिए कि एक से अधिक पत्नी रखने वाले अधिक पुरूष देश में वे हैं जिन्हें कानून के आधार पर बहुविवाह की अनुमति ही नहीं है।
समान नागरिक संहिता देश में कैसे संभव हो सकता है?
विविधता भारत की सुंदरता है। संविधान सभी नागरिकों के लिए "सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय" चाहता है। उसने धार्मिक और जातीय अल्पसंख्यक और सामाजिक-आर्थिक रूप से पिछड़े वर्गों जैसे अनुसूचित जातियां और अनुसूचित जनजातियों के अधिकारों के संरक्षण के लिए विभिन्न तरीके अपनाए हैं। जिस तरह विभिन्न प्रकार के फूलों से बगीचे की खोबसूरती में वृद्धि होती है, इसी तरह विभिन्न संस्कृतियों और रंगों के लोग ही इस महान देश की सुंदरता है। यह भारत का सबसे बुनियादी अवधारणा है।
एक देश एक कानून का सिद्धांत यहां संभव नहीं है। आदिवासी लोगों की अपनी संस्कृति और रीति-रिवाज हैं। एक आदमी के पास एक से अधिक पत्नियाँ हो सकती हैं, साथ ही एक महिला भी एक से अधिक पति रख सकती है। उनके यहां शादी के विभिन्न तरीके हैं और मृतक के संस्कार के लिए अलग तरीके। हिंदुओं संख्या विभिन्न स्थानों पर विभिन्न धार्मिक संस्कार का पालन करती है।
हिंदू, मुस्लिम और अन्य अल्पसंख्यकों के पर्सनल नियमों के तुलनात्मक अध्ययन से मालूम होगा कि इन नियमों में स्पष्ट मतभेद हैं जो किसी भी पर्सनल ला में समानता की अनुमति नहीं देते। तथ्य यह है कि खुद हिंदू कानून मैं विविधता कुछ इस तरह का है कि केवल एक जैसे हिंदू कानून की संभावना भी बाकी नहीं रहता।
हिंदूविवाह अधिनियम 1955’ के तहत अगर केवल शादी की बात की जाए तो हिन्दू की परिभाषा के नीचे आने वाले विभिन्न लोगों की शादियाँ उनके अपने-अपने रीति-रिवाजों के अनुसार अंजाम दी जाएंगी। उदाहरण के लिए, उत्तर भारत में प्रचलित निष्क्रिय पधी कार्यशैली विवाह के अनुसार शादी की प्रक्रिया पूर्ण और लागू माना जाता है यानी अगर कोई जोड़ा पवित्र अग्नि के गिर्द सात चक्कर लगा ले, जिन्हें "सात फेरे" कहा जाता है तो उसे विवाह का रिश्ता माना जाता है।
दूसरी ओर दक्षिण में विवाह के सोयामरिया थाई और सीरथी रुथ तरीके प्रचलित हैं। इन तरीकों के अनुसार अगर दोनों ओर से रिश्तेदारों के सामने यह घोषित किया जाए की ये जोड़ा एक दूसरे से शादी कर रहा है, या जोड़ा एक दूसरे को हार पहना दे, या एक दूसरे की उंगली में अंगूठी पहना दे, या दूल्हा दुल्हन की गर्दन में थाली या मनगलीम बांध दे तो शादी पूर्ण माना जाता है।
इसी तरह दक्षिण भारत में एक हिंदू अपने चचेरे, फोफरे, और मौसेरे, यहां तक ​​कि अपनी भांजी और भतीजी से शादी कर सकता है, लेकिन देश के अन्य भागों के हिंदू इन रिश्तेदारों से शादी नहीं कर सकते।
तथा यह कि हिंदू कानून के तहत शादी के लागू होने के लिए आवश्यक है कि कम से कम एक पार्टी के रीति-रिवाजों के अनुसार शादी को अंजाम दिया जाए। इसलिए अगर कोई जैन किसी बुद्धिस्ट से सिख धर्म की रीति के अनुसार शादी करे तो इसे लागू नहीं माना जाएगा। (शकुंतला बनाम नील कनठ 1972, पारस दीवान द्वारा परिवार ला में दर्ज)
इसलिए यह सवाल बिल्कुल स्वाभाविक है कि क्या इन विविध नियमों को समान करने और सभी के लिए सामान्य कानून बनाना संभव और व्यवहार्य है, जो सभी वर्गों को स्वीकार्य हो?
भारत के पास पहले से हीस्पेशल मैरिज एक्ट 1954’ के रूप में एक वैकल्पिक कानून मौजूद है। इस कानून में उन लोगों के लिए जो किसी धार्मिक कानून से बचना चाहते हैं, शादी से संबंधित सभी मामले, जैसे तलाक, नफ़क़ा और विरासत के लिए एक अच्छा कानूनी रूपरेखा मौजूद है। (देखिए इंडियन स्कसेशन अधिनियम 1952)
भारत में समान नागरिक संहिता का शोशा एक भ्रम और राजनीतिक रणनीति से ज्यादा कुछ भी नहीं है। यह बात बिल्कुल असंभव और तर्कहीन है कि सभी उच्छलते हुए चूजों को एक छोटी टोकरी में रख दिया जाए। इसलिए मौजूदा सरकार ला कमीशन ऑफ इंडिया के माध्यम से आम आदमी के लिए यह हसटरयाई वातावरण क्यों पैदा कर रही है इसके पीछे उद्देश्य का एहसास कोई कर पाए या कर पाए लेकिन श्री मोदी या जो नागपुर स्थित आर एस एस कार्यालय में बैठे हैं अच्छी तरह जानते हैं।
अगर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी वास्तव में मुस्लिम महिलाओं को भारत में आत्मनिर्भर बनाना चाहते हैं जैसा कि उन्होंने लखनऊ की अपनी हालिया भाषण में चिल्ला चिल्ल कर कहा था, तो उन्हें तीन व्यवहार्य रणनीतियों पर ध्यान देना चाहिए: () वह बहादुरी के साथ मुस्लिम महिलाओं को रोजगार और शिक्षा में उपयुक्त आरक्षण दें, इस तरह से ये महिलाएं धीरे धीरे आत्मनिर्भर हो जाएंगी, () वह नशीली चीजों के दुरुपयोग पर रोक लगा सकते हैं जिसने मुस्लिम महिलाओं सहित सभी महिलाओं को अत्याचार का शिकार बना रखा है, () वह तुरंत सांप्रदायिक दंगों को रोकने के लिए एक कानून बना सकते हैं जिसमें मुसलमान औरतें समय समय पर बुरी तरह शिकार हो चुकी हैं।

क्या मोदी और उनकी सरकार इनमें से किसी एक पर भी विचार करेगी?

(लेखक मुहममाद बुराहनुद्दीन क़ासमी मर्कजुल मआरिफ़ एजुकेशन एंड रिसर्च सेंटर मुम्बई के डायरेक्टर और ईस्टर्न क्रिसेंट के एडिटर हैं।  लेखक के विचार पूर्णत: निजी हैं, इस लेख को लेकर अथवा इससे असहमति के विचारों का भी UPUKLive.com स्‍वागत करता है। इस लेख से जुड़े सभी दावे या आपत्ति के लिए सिर्फ लेखक ही जिम्मेदार है। आप लेख के साथ अपना संक्षिप्‍त परिचय और फोटो भी upuklive@gmail.com भेज सकते हैं।)
Name

Agra Ajab Gajab Aligarh Amroha Article Ayodhya Bareilly Bijnor Bulandshaher Business Crime Dehradun Desh Videsh Earthquake Education Eid English News Entertainment Etah Exam Result Exclusive Faizabad Gadgets Ghaziabad Gorakhpur Haldwani Haridwar Independence Day International Itawa Jaspur Jaunpur Job Alert Kanpur Kanth Kasganj Kashipur Kaushambi Koshambi Lifestyle Lucknow Maharajganj Mathura Media Meerut Moradabad Moradabad City Nainital New Delhi Noida Notice Panchayat Chunav Photo Live Pilibhit Politics Ramadan Rampur Religious Sambhal Shayri Shravasti Slider Sports Thakurdwara UPElection2017 US Nagar Uttar Pradesh Uttrakhand Yuva
false
ltr
item
UP UK Live: ट्रिपल तलाक और बहुविवाह: कल्पित कथा बनाम तथ्य
ट्रिपल तलाक और बहुविवाह: कल्पित कथा बनाम तथ्य
ट्रिपल तलाक और बहुविवाह: कल्पित कथा बनाम तथ्य
https://2.bp.blogspot.com/-dYRP0HqhGw0/WBiSCWP6SGI/AAAAAAAA4no/xSxTrtBT-VwOKETf6DD7AsdMQjn9oB_2wCK4B/s320/21OCT143u.jpg
https://2.bp.blogspot.com/-dYRP0HqhGw0/WBiSCWP6SGI/AAAAAAAA4no/xSxTrtBT-VwOKETf6DD7AsdMQjn9oB_2wCK4B/s72-c/21OCT143u.jpg
UP UK Live
http://www.upuklive.com/2016/11/triple-talaq-myths-vs-facts.html
http://www.upuklive.com/
http://www.upuklive.com/
http://www.upuklive.com/2016/11/triple-talaq-myths-vs-facts.html
true
4409257454490627827
UTF-8
Not found any posts VIEW ALL Readmore Reply Cancel reply Delete By Home PAGES POSTS View All RECOMMENDED FOR YOU LABEL ARCHIVE SEARCH ALL POSTS Not found any post match with your request Back Home Sunday Monday Tuesday Wednesday Thursday Friday Saturday Sun Mon Tue Wed Thu Fri Sat January February March April May June July August September October November December Jan Feb Mar Apr May Jun Jul Aug Sep Oct Nov Dec just now 1 minute ago $$1$$ minutes ago 1 hour ago $$1$$ hours ago Yesterday $$1$$ days ago $$1$$ weeks ago more than 5 weeks ago Followers Follow THIS CONTENT IS PREMIUM Please share to unlock Copy All Code Select All Code All codes were copied to your clipboard Can not copy the codes / texts, please press [CTRL]+[C] (or CMD+C with Mac) to copy