तीन तलाक मुसलमानों के लिए बड़ा मुद्दा नहीं, इस्लाम सलाह देता है बिलकुल ही तलाक़ न दे

सबसे अच्छा विकल्प इस्लाम जिसकी सलाह देता है वो बिलकुल ही तलाक़ का ना देना है

म. मुहम्मद बुरहानुद्दीन क़ासमी

तीन तलाक भारतीय मुसलमानों के लिए बिलकुल भी एक बड़ा मुद्दा नहीं है, जैसा के इसे दिखाया और बताया जा रहा है। सभी आकलन के हिसाब से तलाक़ का रेश्यो भारत में हिन्दुओं और ईसाइयों के साथ ही दुनिया के अन्य भागों की तुलना में मुसलमानों के बीच कम है। इसी तरह भारत में हिंदू धर्म के साथ तुलना मैं मुस्लिम पुरुष कम बहुविवाही हैं।

खास बात ये है की अगर इस तरह का कुछ गैर पसन्दीदह काम हो जाता है तो इस्लाम में तलाक़ पाई होइ और विधवा महिलाओं के पुनर्वास के लिए एक अच्छा निज़ाम है। एक बैठक मैं तीन तलाक़ की बात तो छोड़ ही दीजऐ, इस्लाम तो बिलकुल भी तलाक़ देने की सलाह नहीं देता और न ही इसतरह की बातों की हौसला अफ़ज़ाई करता है, बल्की इस्लाम हर सतह पर सुलह सफाई की परसंसा करता है। अब अगर एक मुस्लिम पुरुष या महिला शिक्षाओं का पालन नहीं करता है और कुछ गलत करता है या गलत तरीके से एक वैध रियायत का इस्तेमाल करता है, तो वह उनका व्यक्तिगत अपराध है और इस्लाम या मुस्लिम समुदाय का उससे कुछ लेना देना नहीं है।

अध्ययन बताता है की पारिवारिक जीवन और संबंध में मुसलमान दूसरों की तुलना में बहुत अच्छे हैं। इसका यह मतलब नहीं है कि मुस्लिम परिवारों में कोई विवाद या कोई अशांति नहीं है। लेकिन असल बात ये है के मुस्लिम दुल्हन की संख्या जिसे जिंदा जला दिया गया हो या दुर्घटनाओं की आड़ में मारा गया हो, हिंदुओं की तुलना में बहुत कम है और यह एक तथ्य है सिर्फ परिकल्पना नहीं है।
फिर क्यों मुस्लिम नामों के साथ कुछ नास्तिक सच्चे पक्के मुसलमानों के सामने इस्लाम के बारे में लेक्चर देने मैं लगे हुए हैं? यदि यह उनका रोटी और मक्खन का मुद्दा है या उनके राजनीतिक आकाओं ने उन्हें ये काम सौंपा है तो फिर क्यों एक सच्चा पक्का मुसलमान उनके बारे में सोचे और उनकी बातों पर ध्यान दे? दिलचस्प बात ये है की इन नास्तिक और इस्लाम विरोधी प्रचारकों में से अधिकांश बहुविवाही हैं और उनहोंने अपनी परिवारिक जीवन को बर्बाद किया है। उनके पास अपने ही बच्चों और पत्नियों के लिए कोई समय नहीं है फिर भी वे बहुविवाह और परिवारिक जीवन के खिलाफ लेक्चर देते नज़र आते हैं, क्योंकि टीवी स्क्रीन के लिए मेकअप कर के सामने आना उनका काम है और कुछ पाठकों के लिए मनोरंजक विचार प्रदान करना उनका शेवा है।

वास्तव में ये लोग किया रोकना चाहते हैं-- तीन तलाक़? हक़ीक़त मैं वे इसबात को समझने मैं नाकाम हैं की एक तलाक़ से भी पति और पत्नी हमेशा हमेशा के लिये जुदा होसकते हैं ।

तलाक़ तीन प्रकार के होते हैं: रजई, बाईन और मुगललज़ा। पहली क़िस्म मैं पति दो तलाक़ तक वापसी (रजअत) कर सकता है। दूसरे में, बस एक तलाक़ के बाद ही पति वापसी नहीं कर सकता, हाँ अगर दोनों वापस होने की इच्छा रखते हैं तो इस केस मैं पत्नी की रिज़ामन्दी से पति को पुनर्विवाह करना होगा। तीसरी क़िस्म मुगललज़ा (गंदा) है और वास्तव में इस केस मैं वापस आने के लिए कोई रास्ता नहीं है, हाँ कुछ बहुत ही असाधारण मामलों में, नैतिक, भावनात्मक और शारीरिक तोर पर परेशान करने वाली प्रक्रिया के बाद इसकी इजाज़त है और ऐसा इसलिये है की बाद मैं कोई पति तलाक़ देने से पेहले सो बार सोचे और महिलायं इस तकलीफ से बची रहीं।

तलाक़ के तीसरे प्रकार-- मुगललज़ा (गंदा) -- के नाम से ही इस्लाम में उसकी स्थान का अंदाज़ा हो जाता है। संक्षेप में, यह एक हत्यारा गोली है जिसके बारे मैं आपको सख्ती से सलाह दी जाती है की आप उसका उपयोग ना करें। यह एक वयस्क, समझदार पुरुष के कब्जे में तीन गोलियों के साथ एक लाइसेंस वाली बंदूक की तरह है। उन्हों इसका समुचित उपयोग सीखना चाहिए और इसका दुरुपयोग नहीं करना चाहिए। लेकिन फिर भी अगर वह इसका दुरुपयोग करता है और गलत तरीके से इसे इस्तेमाल करता है तो गोली का असर तो ज़रूर होगा। उन्हें उनकी दुरुपयोग के लिए दंडित किया जा सकता है, लेकिन जो गोली का शिकार होआ है उसे तो तकलीफ उठानी ही होगी। हज़रत उमर (र आ) तलाक़ के इस तीसरे प्रकार के उपयोगकर्ताओं को सज़ा भी देते थे।
एक औरत अगर सही वजह की बुन्याद पर अपने पति से जुदाई चाहती है तो व अपने पति से खुला का मुतालबा कर सकती है। एक आदमी रजई तलाक़ के केस मैं दो तलाक़ तक अपनी पत्नी को तलाक़ दे कर लोटा सकता है। बाईन तलाक़ के मामले में पत्नी को वापस होने और ना होने के बारे मैं पूर्ण इख़्तियार हासिल है। एक आदमी केवल गंभीर मामले में तीन बार तलाक़ का उपयोग कर सकता है लेकिन एक साथ नहीं बल्कि तीन पीरियड मैं (जो लगभग तीन महीने का समय है) और दोनों के लिए उसके बाद वापसी के दरवाजे बंद हो जाएंगे।
सबसे अच्छा विकल्प इस्लाम जिसकी सलाह देता है वो बिलकुल ही तलाक़ का ना देना है। मतलब ये है की इसका इस्तेमाल ही ना करें क्यों की अनुमति वाली चीजों मैं ये सबसे ज़्यादा नापसंदीदह है। जब मामला बिलकुल बिगड़ जाए और उससे बहार आने का कोई रास्ता ना हो तो पेहले विकल्प का उपयोग करें और एक तलाक़ दें फिर एक पीरियड तक प्रतीक्षा करें। उस पीरियड के अंदर आदमी के पास वापस आने के लिए विकल्प मौजूद है लेकिन जब वक़्त खत्म हो जाए तो वैवाहिक संबंध खत्म होजाए गा। अब व महिला किसी दूसरे आदमी से पुनर्विवाह कर सकती है। लेकिन अगर औरत इंतजार करती है या शादी नहीं करती है तो फिर वे आपसी सहमति से पुनर्विवाह कर सकते हैं।
म. मुहम्मद बुरहानुद्दीन क़ासमी
या फिर दोनों बहुत गुस्से में हैं और तुरंत अलग होना चाहते हैं, तो वे तलाक़ के दुसरे प्रकार—बाईन-- का प्रयोग करसकते हैं। यहाँ आदमी पीरियड के भीतर फिर से पत्नी को वापस नहीं ले सकता, सिर्फ एक तलाक़ के बाद वह वापस लेने की अपनी सारी शक्ति खो देता है। इस केस मैं महिला को पूरा अधिकार हासिल है और पूरी तरह से व मजबूत है। इस केस मैं फिर से एक साथ आने का विकल्प पीरियड के भीतर या बाद आपसी सहमति से पुनर्विवाह है। उलमा अवर मुफ़्ती हमेशा तलाक़  के केवल पहले प्रकार के उपयोग करने की सलाह देते हैं, जो की तलाक़ की तीनों किस्मों मैं बेहतर है।
तलाक़, तलाक़, तलाक़ एक अपराध है, लेकिन यह मार भी डालता है। हत्यारा को उसके अपराध के लिए दंडित किया जा सकता है और सज़ा दी जासकती है, लेकिन अगर कोई साधन का  दुरुपयोग करता है तो साधन को जिम्मेदार नहीं क़रार दिया जा सकता।

सारांश में केंद्र में वर्तमान सरकार और कुछ तथाकथित मुस्लिम महिला संगठन भारत की शीर्ष अदालत में तीन तलाक़ और बहुविवाह मुद्दे के माध्यम से जो करने की कोशिश कर रहे हैं, वो भारतीय समाज मैं गड़बरी पैदा करने की एक और कोशिश के सिवा कुछ भी नहीं है।

(लेखक मार्कजुल मआरिफ़ एजुकेशन एंड रिसर्च सेंटर मुम्बई के डायरेक्टर और ईस्टर्न क्रिसेंट के एडिटर हैं।लेखक के विचार पूर्णत: निजी हैं, इस लेख को लेकर अथवा इससे असहमति के विचारों का भी UPUKLive.com स्‍वागत करता है। इस लेख से जुड़े सभी दावे या आपत्ति के लिए सिर्फ लेखक ही जिम्मेदार है। अगर आप अपना पक्ष रखना चाहते हैं तो अपना संक्षिप्‍त परिचय और फोटो भी upuklive@gmail.com भेजें।)
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