मेरी उंगलियों में करंट लगाया गया, बेड़ियों से बांधकर डंडों से पिटाई की गई – मुफ्ती अब्दुल क़यूम

मेरी उंगलियों में करंट लगाया गया, बेड़ियों से बांधकर डंडों से पिटाई की गई – मुफ्ती अब्दुल क़यूम

”फिर एक दिन मुझे रात में कहीं ले जाया गया. देखकर लग रहा था कि ये अहमदाबाद एयरपोर्ट के पीछे का हिस्सा है। वहां पहुंचकर कहा गया, ये कोतरपुर है। तेरे लतीफ को हमने यहीं मारा है, उन्होंने मेरे आसपास पांच गोलियां चलाईं, मुझे लगा कि अगर मैं नहीं माना तो यहीं एनकाउंटर हो जाएगा।” – मुफ्ती अब्दुल क़यूम
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मुहम्मद ज़ाहिद
अहमदाबाद में मेरे प्रवास के अंतिम दिन मेरे एक फेसबुक मित्र ने मुझसे कहा कि आपसे मिलना है, मैंने उनसे कहा कि एक शर्त पर मिलूंगा, आप मेरी मुलाकात तीश्ता शीतलवाड़, मुफ्ती अब्दुल क़यूम और शमशाद पठान से कराने की व्यवस्था करिए। एक घंटे बाद ही फोन आ गया कि तीश्ता शीतलवाड़ तो मुम्बई में हैं परन्तु मुफ्ती अब्दुल क़यूम आपका दोपहर में लंच पर इंतजार करेंगे, शमशाद पठान से भी वहीं मुलाकात हो जाएगी।

मैंने अपना व्यवसायिक कार्य जल्दी जल्दी में समाप्त किया कर ली और चल दिया मुफ्ती साहब और शमशाद पठान से मिलने। मुफ्ती साहब उस मोहल्ले के चौराहे पर चारपाई पर बैठे मेरा इंतजार कर रहे थे। चेहरा तो पहचाना ही था परन्तु सहसा विश्वास नहीं हुआ कि 11 साल का ज़ुल्म साजिशों के साए में बर्दाश्त करने वाला एक शख्स इतना खुल्लमखुल्ला चौराहे पर चारपाई पर बैठा है। मुझे लगा कि वो नहीं हैं, परंतु दोस्तों ने मुलाकात कराई तो मैने कहा कि मुफ्ती साहब इतने खतरे के बावजूद आप ऐसे सड़क के किनारे खुले में बैठे है। मुफ्ती साहब ने हाथ ऊपर करके खुदा की ओर इशारा किया कि “फाँसी” से चंद घंटे पहले उसी ने बचाया और वही जब चाहे मेरी जान ले सकता है।

फिर हम सब एक कमरे में, इस्लामिक तरीके से एक ही प्लेट में सबने खाना खाया, हमने एक दूसरे से ना किसी की जाति पूछी ना फिरका पूछा, मुफ्ती साहब अपने उपर हुए ज़ुल्म को बताते रहे और मेरी आखें गीली होतीं चली गयीं । फिर कल मैने लाईव आने का फैसला किया।

मुफ्ती साहब की रुला देने वाली किताब “11 साल सलाखों के पीछे” और कुछ मीडिया तथा मुझसे अपनी आप बीती बताने का कुछ अंश यूँ है।

मुफ्ती क़यूम कहते हैं, 17 अगस्त 2003 को मग़रिब की नमाज़ के बाद चार मुसलमान पुलिस वाले मुझे पूछताछ के लिए क्राईमब्रांच ले गये और फिर मुझे 13 दिन की पिटाई के बाद अक्षरधाम मंदिर की आतंकवादी घटना का मास्टर माइंड होना कबूल करने का दबाव डालने लगे। ”मुझसे गुनाह क़बूल करने को कहा गया। मेरी उंगलियों में करंट लगाया गया बेड़ियों से बांधकर डंडों से पिटाई की गई।”

जब क़यूम ने गुनाह क़बूल करने से इनकार कर दिया, तब अत्याचार और बढ़ गया। ”रोज मुझे मारा जाता। मैं बेहोश होता, उठता और फिर बेहोश हो जाता।”

अब्दुल लतीफ अहमदाबाद का एक कुख्यात गैंगस्टर था, जिसका एनकाउंटर यहीं हुआ था । कोतरपुर वही जगह है, जहां 2004 में इशरत जहां और उसके तीन दोस्तों को फ़र्ज़ी मुठभेड़ में मार गिराया गया था।

वह कहते हैं, “हमारी नाराज़गी सिस्टम से हो सकती है लेकिन हम भी मुल्क के उतने ही हैं जितने हिन्दू। कौम के मुट्ठीभर लोगों की ग़लत हरकत के लिए सबको जिम्मेदार नहीं ठहरा सकते।”

जेल में क़यूम के 11 साल बहुत ख़राब बीते। पर उम्मीद जग जाती थी कि सुप्रीम कोर्ट में तो न्याय मिलेगा ही।

मुफ्ती अब्दुल क़यूम कहते हैं, “पूरे केस में सबूत के तौर पर क्राइम ब्रांच ने केवल दो चिट्ठियां पेश कीं। जो उनके अनुसार मैंने लिखकर उन फिदायीन को दी थीं, जिन्होंने अक्षरधाम पर हमला किया।”

जब सुप्रीम कोर्ट ने फिदायीन की पैंट और पोस्ट मार्टम रिपोर्ट देखी तो पूछा कि इनकी लाशें खून और मिट्टी में लथपथ हैं, पैर में इतनी गोलियां लगीं हैं और चिट्ठियों पर खून का एक कतरा तक नहीं, ऐसा क्यों ?

वह कहते हैं, ”क़ानून ने हमें बेगुनाह साबित कर दिया लेकिन उन 11 साल का हिसाब कौन देगा? जब मुझे फांसी की सजा हुई तो अख़बार में बड़े बड़े फोटो छपे जब रिहा हुआ तो कुछ ही अख़बारों और चैनलों ने ख़बर दिखाई।”

मुहम्मद ज़ाहिद
क़यूम कहते हैं, “अब हम सोच रहे हैं कि जिन लोगों की वजह से हम 11 साल जेल में रहे उन पर मुक़दमा करें और हिसाब मांगें।” और उसकी तैयारी कर ली गयी है।

गुजरात उच्च न्यायालय तक से फाँसी की सज़ा पाए मुफ्ती अब्दुल क़यूम को बेगुनाह सिद्ध कराने में 54 लाख खर्च हुए, सोचिएगा कि कितने लोग ऐसे इसी 54 लाख के इंतजाम ना होने से जेलों में सड़ रहे होंगे या फाँसी पर झूल गये।

“11 साल सलाखों के पीछे” के महत्वपूर्ण अंश मैं अपनी वाल पर एक पोस्ट के रूप में शेयर करता रहूँगा। जिनको किताब की हार्ड कापी चाहिए वह पब्लिशर से मँगा सकता है, किताब का मूल्य मात्र 190/= है।

(मुहम्मद ज़ाहिद फेसबुक यूज़र हैं। यह लेख उनकी टाइम लाइन से लिया गया है। इस लेख के विचार पूर्णत: निजी हैं, इस लेख को लेकर अथवा इससे असहमति के विचारों का भी UPUKLive.com स्‍वागत करता है । इस लेख से जुड़े सभी दावे या आपत्ति के लिए सिर्फ लेखक ही जिम्मेदार है। यदि आप कुछ कहना चाहते हैं तो पोस्‍ट के साथ अपना संक्षिप्‍त परिचय और फोटो भी upuklive@gmail.com भेजें।)
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