“कुरआन सब के लिए” – मो. रफीक चौहान

“कुरआन सब के लिए” – मो. रफीक चौहान

हम मुस्लमान अक्सर बहाने बनाते है की हमारे पास कुरआन मजीद का तर्जुमा पढने का टाइम नहीं है। हम अपने रोज़-मर्रा के कामों मे मसरुफ़ है, अपनी पढाई में, अपने कारोबार में, वगैरह वगैरह।

हम सब ये जानते है की जो भी वक्त हम स्कुल-कालेज में लगाते है और कई किताबें हिफ़्ज़ (मुहं ज़बानी याद) कर लेते है, क्या हमारे पास कुरआन मजीद पढने का टाइम नही हैं? अगर आप कुरआन मजीद का तर्जुमा पढेंगे, चन्द दिनॊं मे पढ सकते है।

लेकिन हजरत मुहम्मद (रसुल अल्लाह सल्लाहोअलैह वस्सलम) फ़र्माते है:

“कि जो कोई तीन दिन से कम वक्त मे कुरआन मजीद को पुरा पढता है तो वो कुरआन मजीद को समझ कर नहीं पढता है” (तिर्मिधी, 2949)

अगर आप सुकुन से पढेंगें तो इन्शाल्लाह आप सात दिन मे कुरआन मजीद के तर्जुमें को पुरा पढ़ लेंगे, अगर आप रोज़ कुरआन का एक पारा पढेगें तो एक महीने में आप कुरआन को पुरा पढ़ लेंगें। जो डिगरी आप हासिल करते है स्कुल और कालेज जाकर वो आप को इस दुनिया में फ़ायदा पहुचां सकती है और नहीं भी पहुचां सकती है क्यौंकी हम जानते है की कई डिग्री वाले बेकाम घुम रहे हैं लेकिन अल्लाह सुब्नाह व तआला वादा देते है की अगर आप इस कुरान मजीद को अच्छी तरह समझ कर पढेंगे तो आप को आखिरत मे ही नहीं इस दुनिया मे भी इन्शाल्लाह फ़ायदा होगा।

अल्लाह तआला फरमाता है :

“ये वो किताब है जिसमे कोई शक नही जो तकवा (अल्लाह से डरनें वाले) रखते है” (सुरह बकरह, आयत 1-2)

मिसाल के तौर पर आपका कोई करीबी दोस्त फ़्रांस से हिन्दुस्तान घुमने के लिये आता है वो हिन्दुस्तान घुमता है और आपके घर पर एक हफ़्ता रुकता है और फिर वापस चला जाता है, अपने घर पहुचने के बाद आपकॊ वो एक खत लिखता है लेकिन उसको हिन्दी या उर्दु नही आती है उसे फ़्रेंच मे महारत हासिल है तो वो आपको खत भी फ़्रेंच मे लिख्ता है।

आपको फ़्रेंच आती नही है तो फिर आप क्या करेंगे?

उस आदमी को ढुढंगे जिसे फ़्रेंच आती है और जो आपकॊ आपके करीबी दोस्त के खत का तर्जुमा करके बताये की आपके दोस्त ने आपको क्या लिख कर भेजा है।

क्या आपका फ़र्ज़ नही होता की आप जानें की आपके रब, आपके खालिक, अल्लाह सुब्हान व तआला ने अपने आखिरी पैगाम कुरआन मजीद मे आपके लिये क्या लिखा है?

हमें कुरआन शरीफ़ का तर्जुमा करने की ज़रुरत नही है, अल्हम्दुलिल्लाह कुरआन शरीफ़ का तर्जुमा हर अहम ज़ुबान मे हो चुका है आपको सिर्फ़ उसको मार्कट से जाकर खरीदने की ज़रुरत है। हमें कुरआन शरीफ़ का तर्जुमा पढना चाहिये उस ज़बान मे जिसमें हमें महारत हासिल है।

अकसर मुस्लमान समझते है कि ये कुरआन शरीफ़ सिर्फ़ मुसलमानॊं के लिये है और इसे गैर-मुसलमानॊं को नही देना चाहिये ये हमारी गलतफ़हमी है हमारा वहम क्यौंकी अल्लाह सुब्हान व तआला फरमाता है कुरआन शरीफ़ मे:

“ये किताब नाज़िल कि गयी थी मौहम्मद रसुल अल्लाह सल्लाहोअलैह वस्सलम पर ताकि वो सारी इन्सानियत को अंधेरे से रोशनी मे ले आयें” (सुरह इब्राहिम, आयत 1)

कुरआन मजीद मे ये कहीं नही लिखा हुआ है की कुरआन मजीद सिर्फ़ मुसलमान या अरबों के लिये है। यहां आपने पढा की अल्लाह तआला फ़रमाते है की कुरआन मजीद मौहम्मद (रसुल अल्लाह सल्लाहोअलैह वस्सलम) पर इसलिये नाज़िल कि गयी थी कि वो सारी इन्सानियत को अंधेरे से रोशनी मे लेकर आयें।

अल्लाह तआला फरमाता है:

“ये कुरआन मजीद सारी इन्सानियत के लिये पैगाम है और उनके लिये जो समझते है और उनसे कह दो कि अल्लाह एक है और समझने वाले अल्लाह के कलाम को समझेंगे” (सुरह इब्राहिम, आयत 52)

अल्लाह तआला फरमाता है:

“रमज़ान वो महीना है जिसमें कुरआन शरीफ़ नाज़िल हो चुका था और ये सारी इन्सानियत के लिये हिदायत की किताब है ताकि लोग समझ सकें की गलत क्या और सही क्या है” (सुरह बकरह, आयत 185)

अल्लाह तआला फरमाता है:

“हमनें ये किताब नाज़िल कि मौहम्मद रसुल अल्लाह सल्लाहोअलैह वस्सलम पर ताकि वो हिदायत दे इंसानों को” (सुरह अल ज़ुम्र, आयत 41)

कुरआन मे ये कही नही लिखा है कि ये कुरआन सिर्फ़ मुसलमानों या अरबों के लियें नाज़िल कि गयी है और कुरआन मे ये कहीं नहीं लिखा है कि मुसलमानॊं को हिदायत दें और हमारे आखिरी पैगम्बर मौहम्मद (सल्लाहोअलैह वस्सलम) सिर्फ़ अरबों या मुसलमानॊं के लिये नही भेजे गये थें।

अल्लाह तआला फरमाता है:

“हमने तुम्हे भेजा है एक रहमत सारी इन्सानियत, सारे जहां के लिये” (सुरह अम्बिया)

अल्लाह तआला फरमाता है:

“हमने तुम्हें भेजा एक पैगम्बर सारी इन्सानियत के लिये ताकि आप लोगो को अच्छाई की तरफ़ बुलायें और बुराई से रोकें” (सुरह सबा, आयत 28)

लेकिन अकसर लोग ये नही जानते है। कुरआन की इन आयतॊं से समझ मे आता है की कुरआन मजीद और मौहम्मद (सल्लाहोअलैह वस्सलम) सारी इन्सानियत के लिये भेजे गये थे मुसलमानॊ के लिये भी और गैर-मुसलमानों के लिये भी।

हम मुसलमान लोग कुरआन मजीद को समझ के तो पढते नहीं लेकिन उसकी इतनी हिफ़ाज़त करते है की दूसरों को भी नही पढनें देते।

कह्ते है कुरआन मजीद को जो लोग नजीज़ (नापाक/अपवित्र) है वो हाथ नही लगा सकते हैं और कुरआन मजीद की एक आयत का हवाला देते है:

“ये वो कुरआन अल्लाह तआला ने नाज़िल किया और इसको कोई भी हाथ नही लगायेंगा सिर्फ़ वो जो मुताहिरीन हैं” (सुरह वाकिया, आयत 77-82)

अगर इस आयत के ये मायने होते की इस कुरआन शरीफ़ को जो मुसफ़ (कापी) है को कोई भी हाथ नही लगा सकता है सिर्फ़ उसके जो जो पाक है, वुज़ु मे हैं, तो कोई भी शख्स, कोई भी गैर-मुस्लिम बाज़ार से सौ या दो सौ रुपये में कुरआन खरीद कर उसे हाथ लगा सकता है और कुरआन मजीद गलत साबित हो जायेगा।

कुरआन इस आयत के मायने इस कुरआन मजीद, इस किताब जो मुसह्फ़ है, के नही है बल्कि उस कुरआन मजीद जो लौहे-महफ़ुज़ (सातवें आसमान) में है जिसका ज़िक्र (सुरह बुरुज, आयत 22) में है, अगर आप देखेगें कि इस आयत के मुताबिक कि कुरआन क्यों नाज़िल हुआ कि कुछ लोग गैर-मुस्लिम वगैरह ये कहते थे कि मौहम्मद (सल्लाहोअलैह वस्सलम) पर ये “वही” (पैगाम) शैतान के पास से आती थी तो अल्लाह तआला फरमाता है:

“ये ‘लौह-महफ़ुज़’ के नज़दीक कोई भी नही आ सकता है सिवाय उसके जो मुताहिरीन हैं।” (सुरह बुरुज, आयत 22)

मुताहिरीन के मायने है वो जिसने कोई भी गुनाह नही किया, वो बिल्कुल पाक है सिर्फ़ जिस्म से ही नही सारे तरीके से। अगर आप तबरिगी तफ़्सील के अन्दर वो कह्ते है की जिस कुरान का ज़िक्र हो रहा है उस कुरआन का जो सातवें आसमान मे लौहे-महफ़ुज़ के अन्दर जिसको कोई हाथ नही लगा सकता सिवाय फ़रिश्तों के”। तो शैतान के करीब आने का तो सवाल ही नही उठता इसके माईने ये नही कोई इन्सान जो पाक नही है वो हाथ नही लगा सकता है। पाक होना, वुज़ु मे होना अच्छी बात है लेकिन इसका मतलब ये नही है की ये फ़र्ज़ है।

कुछ लोग ये भी कह्ते है की हम गैर-मुस्लिम को कुरआन का सिर्फ़ तर्जुमा देंगे अरबी मतन नही देंगे, कुरआन शरीफ़ का तर्जुमा और अरबी मे साथ-साथ नही देंगे। लेकिन मै अगर किसी गैर-मुस्लिम को कुरआन देता हू तो मैं तर्जुमें के साथ अरबी का कुरआन भी देता हु क्यौंकी अगर तर्जुमें मे गलती हो तो वो इन्सान की तरफ़ है अल्लाह की तरफ़ से नही है, और तर्जुमें तो इन्सान करते है और गलती तो कहीं न कहीं करेंगे।

मिसाल के तौर पे आप पढेंगे (सुरह लुकमान, आयत 34), उसमें अल्लाह तआला फरमाता है:

“अल्लाह के अलावा कोई भी नही जानता के मां के पेट मे जो बच्चा है वो कैसा होगा” (सुरह लुकमान, आयत 34)

लेकिन आप उर्दु का तर्जुमा पढेंगे तो उसमें अकसर ये लिखा मिलेगा कि “कोई भी नही जानता कि मां के पेट मे जो बच्चा है उसका जिन्स (लिंग) कैसा होगा”

और जो शख्स थोडा बहुत साइंस के बारे मे जानता होगा वो बता सकता की आज के दौर में ये जानना बहुत आसान काम है की मां के पेट मे बच्चा लडंका है या लडकी।

जबकी अरबी मे जिन्स लफ़्ज़ है ही नही। कुरआन मजीद मे लिखा है कि “कोई भी नही जानता सिर्फ़ अल्लाह के सिवा की मां के पेट के अन्दर बच्चा कैसा होगां।” कैसा होगा के माईने की पैदा होने के बाद वो अच्छा होगा या बुरा, दुनिया के फ़ायदेमन्द होगा या नुक्सानदायक, वो जन्नत जायेगा या जह्न्नम कोई भी नही जानता सिवाय अल्लाह के………..।

-मोहम्मद रफीक चौहान (एडवोकेट)
(मोहम्मद रफीक चौहान सामाजिक कार्यकर्त्ता और लेखक हैं। पेशे से यह अधिवक्ता है। मोहम्मद रफीक चौहान डिस्ट्रिक्ट कोर्ट, करनाल (हरियाणा) के लॉयर हैं। इनका पैतृक निवास करनाल (हरियाणा) है। यह फेसबुक यूज़र हैं। यह लेख उनकी टाइम लाइन से लिया गया है। इनकी लेखनी बेबाक, एवं सत्य पर आधारित होती है। यह लेख उनकी फेसबुक की टाइम लाइन से लिया गया है। इस लेख के विचार पूर्णत: निजी हैं, इस लेख को लेकर अथवा इससे असहमति के विचारों का भी UPUKLive.com स्‍वागत करता है । इस लेख से जुड़े सभी दावे या आपत्ति के लिए सिर्फ लेखक ही जिम्मेदार है।)
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“कुरआन सब के लिए” – मो. रफीक चौहान
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