नफसानी ख्वाहिशात को क़ुर्बान करने का नाम है हज और ईदुल अज़हा

नफसानी ख्वाहिशात को क़ुर्बान करने का नाम है हज और ईदुल अज़हा

मेहदी हसन एैनी कासमी

इस्लाम के जितने भी अहकामात हैं उनका बुनियादी मक़सद अपने नफ्स को मार कर, मनचाही जिंदगी को छोड़ कर रब चाही जिंदगी गुज़ारना है, इसी तरह कुरबानी भी इस लिए वाजिब किया गया है ताकि मोमिन बंदा अपने माल की,ख्वाहिशात की कुरबानी दे।  

हज़रत इब्राहीम अ. द्वारा हजरत इस्माईल अ़ की कुरबानी को अल्लाह ने इतना पसंद फरमाया कि उसे उम्मते मुहम्मदिया के मालदारों यानी साहिबे  निसाब लोगों (जिस के पास इतना माल हो कि जिस पर ज़कात फर्ज़ हो सके.और कोई क़र्ज़ ना हो )पर ज़रूरी कर दिया। 

फिर ये भी हुक्म दिया गया उस जानवर की कुरबानी के गोश्त  को सही मायनों में इस्लाम के अहकामात और हिकमतों के मुताबिक़ बनाने के लिए तीन बराबर हिस्सों में बांटा जाए. एक हिस्सा ग़रीबों,मुहताजों,फ़कीरों को दें, दूसरा हिस्सा रिशतेदारों,को दें, तीसरा हिस्सा खुद अपने अहल व अ्याल के लिए रखें। 

इस से समझ आता है कि इस्लाम से ज़्यादा इंसानियत की खिदमत और हिफा़ज़त करने वाला दुनिया में कोई धर्म नहीं. साथ ही यह जानना बहूत ज़रूरी है कि बकरा ईद का असल नाम “ईदुल-अज़हा” है, मुसलमानों में साल में दो ही त्यौहार मजहबी तौर पर मनाए जाते हैं एक “ईदुल फ़ित्र” और दूसरा “ईदुल अज़हा”,..

ईदुल फ़ित्र जहाँ रमज़ान के पूरा होने पर मनाई जाती है वहीं वह कुरआन के नाज़िल होने के शुरू होने की ख़ुशी भी अपने अन्दर रखती है. ऐसे ही ईदुल अज़हा जहाँ हज के पूरा होने पर मनाई जाती है, वहीं इन्ही दिनों में कुरआन 23 साल में नाज़िल हो कर पूरा हुआ था, और दीन के मुकम्मल होने का ऐलान कर दिया गया था. (सूरेह मायदा 3) 

ईदुल अज़हा असल में हज से जुड़ी हुई इबादत  है, कुर्बानी हज का अहम एक हिस्सा है, पूरी दुनियां के मुसलमान तो हर साल हज नहीं कर सकते इस लिए ईदुल अज़हा के ज़रये वो हज से जुड़ते हैं,.. उन्ही की तरह क़ुरबानी करके अल्लाह के लिए क़ुरबानी के ज़ज्बे का इज़हार करते हैं और हाजी की तरह ही हज के दिनों में नमाज़ के बाद तकबीर पढ़ते और बाल वगैरह के काटने से परहेज़ करते हैं.

हज इसलाम में एक अहम इबादत है यह इस्लाम की पांच बुन्यादों में से एक है. क़ुरबानी का लफ्ज़“क़ुर्ब” से बना है जिसका मतलब होता है ‘करीब होना’. यानि ईदुल अज़हा को अपने जानवर को ज़िबह करने का मकसद अल्लाह का क़ुर्ब हासिल करना होता है, यानि अल्लाह से अपनी नजदीकियों को बढ़ाना.

वैसे तो इसलाम में कुर्बानी का ज़िक्र आदम (अ) के ज़माने से मिलता है, लेकिन इसलाम में बुनयादी तौर पर कुर्बानी हज़रत इब्राहीम (अ) के ज़माने से है जब उन्होंने अपने बेटे को कुर्बान करने की कोशिश की तो अल्लाह ने उनके बेटे के बदले एक जानवर की कुर्बानी ली तब से यह अपनी जान की कुर्बानी के निशान के तौर पर हर साल दी जाती है ,..

क़ुरबानी में कई हिकमते हैं लेकिन इस का सबसे अहम् फलसफा यह है कि अल्लाह के लिए बन्दे की जानिब से ये इबादत सबसे बढ़ कर है.इस बात को अच्छी तरह समझ लेना चाहिए कि इसलाम में क़ुरबानी एक इबादत की हेसियत रखती है और जैसा की आप जानते हैं कि इबादतें जितनी भी हैं वो सब बन्दे का अल्लाह से ताल्लुक का इज़हार होती हैं. जैसे बदन से बंदगी का इज़हार नमाज़ में होता है और माल से इबादत करने का इज़हार ज़कात और सदके से होता है, ठीक ऐसे ही क़ुरबानी जान से बंदगी करने का इज़हार है.

क़ुरबानी में अपने जानवर की जान को अल्लाह के नाम ज़िबह करके असल में बंदा इस जज़्बे का इज़हार कर रहा होता है कि मेरी जान भी अल्लाह की दी हुई है और जिस तरह आज मैं अपने जानवर की जान अल्लाह के लिए दे रहा हूँ अगर अल्लाह का हुक्म हुआ तो अपनी जान भी मैं देने के लिए तैयार हूँ. यही वह जज़्बा है जो क़ुरबानी की असल रूह है अगर हमारे अन्दर अपने जानवर की क़ुरबानी के साथ यह जज़्बा नहीं है तो यह असल क़ुरबानी नहीं है फिर यह ऐसे ही है जैसे रोज़ लोग अपने खाने के लिए जानवर ज़िबह करते हैं.

पहले ज़माने में अपने जानवरों को दो ही वजह से ज़िबह किया जाता था, एक उसका गोश्त खाने के लिए और दूसरा कुछ मजहबों में अपने देवताओं की मूर्ती को जानवर का खून देने का रिवाज था, उससे यह समझा जाता था कि यह देवता खून पीते हैं और उससे खुश होते हैं ,..

लेकिन क़ुरबानी में यह दोनों वजह सिरे से पाई ही नहीं जाती, क़ुरबानी के पीछे जो जज़्बा होता है वह यही है कि मेरी जान मेरे लिए नहीं अल्लाह के लिए है, यही जज़्बा क़ुरबानी का मकसद है और यही जज़्बा अल्लाह को मतलूब है, 

चुनाचे कुरआन में फ़रमाया  “अल्लाह के पास ना तुम्हारी कुर्बानियों का गोश्त पहुँचता है और ना उनका खून, अल्लाह को सिर्फ तुम्हारा तक़वा पहुँचता है,…”  (सूरेह हज: 37)
क़ुरबानी इस नेमत का शुक्र भी है कि अल्लाह ने जानवरों को हमारे काबू में कर दिया है,  क़ुरबानी इसका भी शुक्र अदा करना है कि उसमे आप अपने जानवर को अल्लाह के लिए कुर्बान करते हैं. इसी लिए कुरआन में इरशाद है:
अल-कुरान: “और हमने हर उम्मत के लिए क़ुरबानी मुक़र्रर की है ताकि अल्लाह ने उनको जो चौपाए बख्शे हैं उन पर वो (ज़िबह करते हुए) उसका नाम लें. पस तुम्हारा मअबूद एक ही मअबूद है इसलिए तुम अपने आप को उसी के हवाले कर दो, और खुश खबरी दो उन लोगों को जिनके दिल अल्लाह के आगे झुके हुए हैं ,..” – (सूरेह हज 34)

अल-कुरान: “अल्लाह ने जानवरों को (इसलिए) यूँ तुम्हारे क़ाबू में कर दिया है ताकि जिस तरह अल्लाह ने तुम्हें बनाया है उसी तरह उसकी बड़ाई करो और नेक लोगों को (आने वाली ज़िन्दगी की) खुश खबरी दो,.(सूरेह हज 37)

एक अहम हिकमत क़ुरबानी की यह भी है कि इसके ज़रिये हज़रत इब्राहीम (अ) और उनके परिवार की तौहीद के लिए की जाने वाली महनते, मशक्कतें और कुरबानियों को याद किया जाए,.
उस लम्हे को ख़ास कर याद किया जाए जब हज़रत इब्राहीम (अ) को ख्वाब में हुक्म दिया गया कि वह अपने बेटे हज़रत इस्माइल (अ) को अल्लाह के लिए कुर्बान करें, तो उन्होंने इस हुक्म पर अमल करने की ठानी और फिर अपने बेटे हज़रत इस्माइल (अ) से मश्वरा किया तो उन्होंने भी ख़ुशी से अल्लाह पर कुर्बान होने की इच्छा ज़ाहिर की,..
इस घटना में जहाँ एक तरफ हज़रत इब्राहीम (अ) के सब्र, वफादारी और अल्लाह ही का होने की तालीम है क्यों कि एक बाप के लिए अपने बच्चे की गर्दन पर छूरी चलाना खुद को मार डालने से कहीं ज़्यादा मुश्किल काम है, वहीं उनके बेटे ने भी अल्लाह के आगे झुकने में कोई कसर नहीं छोड़ी थी, कुरआन में उन बाप बेटों की बात चीत कुछ इस तरह नक़ल हुई है –
इब्राहीम ने कहा – “ऐ मेरे बेटे मैं ख्वाब में तुम्हे कुरबान करते हुए देखता हूँ तो तुम बताओ कि इस बारे में तुम्हारी क्या राय है ?..”
बेटे ने जवाब दिया – “अब्बू जान आप को जो हुक्म दिया जा रहा है उसे ज़रूर पूरा कीजये, अगर अल्लाह ने चाहा तो आप मुझे सब्र करने वालों में पाएँगे,..” – (सूरेह साफ्फात १०२)
सच है कि यह जवाब इब्राहीम के बेटे का ही हो सकता था. इसमें हज़रत इस्माइल (अ) का कमाल यह ही नहीं कि कुरबान होने के लिए तैयार हो गए बल्कि कमाल यह भी है कि अपनी अच्छाई को अल्लाह की तरफ मंसूब किया कि ”अगर अल्लाह ने चाहा तो आप मुझे सब्र करने वालों में पाएँगे”

इसी हवाले से एक और हिकमत इस हदीस में बयान हुई है –
अल्लाह के रसूल (स) से सहाबा ने पूछा कि ऐ अल्लाह के रसूल (स) यह कुरबानियां क्या हैं ?
आप (स) ने जवाब दिया कि तुम्हारे बाप इब्राहीम का तरीका,..” – (मुसनद अहमद 18797, इब्ने माजा 3127)
– इस हदीस से क़ुरबानी की हिकमत समझ में आती है, वो है हज़रत इब्राहीम (अ) के तरीके को ज़ाहिरी तौर पर अंजाम दे कर उसको अमली तौर से अपनी ज़िन्दगी में शामिल करना ,..
इब्राहीम सिर्फ एक नाम नहीं है बल्कि इब्राहीम एक सिंबल है तौहीद पर ईमान का,इब्राहीम एक सिंबल है सच्चाई को अकली बुन्यादों पर पा लेने का,इब्राहीम एक सिंबल है सच्चाई के लिए कुरबानियों का,इब्राहीम एक सिंबल है अपनी और अपने परिवार की पूरी ज़िन्दगी अल्लाह के हवाले कर देने का.हम जानते हैं हज़रत इब्राहीम (अ) ने तौहीद के मामले में अपने बड़ों से अपने बाप दादाओं के दीन से कोई समझोता नहीं किया,....
जब कुरबानी की हिकमतें और उसका इतिहास मालूम हो गया, तो अब ये समझ लेना चाहिए कि जो लोग ये कहते हैं कि कुरबानी के नाम पर हजा़रों जानवरों को बलि देने से बेहतर ये है कि हम उन्हीं पैसों से ग़रीबों की मदद करदें. याद रखिये कुरबानी खून बहाने का नाम नहीं है बल्कि एक जज़्बे का इज़हार है, और इबराहीम अ.
की सुन्नत पर अमल करना है जो सिर्फ़ इस तरह से ही मुमकिन हो सकता है. हज के मौक़े पर सारी दुनिया के मुसलमान भी खुद को हाजियों की तरह बनाने की कोशिश करते हैं ताकि खुदा उन्हें भी अपने घर में हाजिर होने की तौफीक़ दे......

बस इतना समझ लीजिए कि हज और कुर्बानी अपने अल्लाह से इश्क़ का इज़हार करने का नाम है.और इस फलसफे को सिर्फ़ सच्चा पक्का मोमिन ही समझ सकता है। 
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