‘स्कर्ट दोष’ के शिकार भारतीय मर्दों से अपील!

‘स्कर्ट दोष’ के शिकार भारतीय मर्दों से अपील!

रवीश कुमार

जो मर्द आगरा के नहीं है, उनके लिए भी यह अपील है। इसे समाजशास्त्रियों ने रवीशाना अपील की संज्ञा दी है,बाकी विशेषण ख़ुद जोड़ लें। तो अपील ये है कि भारत में बहुत बड़ी तादाद में विदेशी महिलाएँ आ रही हैं। उनसे कहा गया है कि वे पहनते समय यहाँ की भावना का ख़्याल रखें। अपने लिए न सही लेकिन भावना के लिए ठीक से सजें। ये भावना आम तौर पर धार्मिक स्थलों के परिसर में रहती है। हम तो समझे थे कि धार्मिक स्थल पर किसी की नज़र ही नहीं पड़ेगी कि कोई स्कर्ट में है या.. क्योंकि वहाँ तो सबकी नज़र वहाँ ही होती है। ध्यान के अलावा किसे ध्यान होगा कि बाक़ी ने क्या पहना है, क्या नहीं।
 
अब जब विदेशी महिलाएँ स्थानीय संस्कृति का ख़्याल रख सकती हैं तो देसी मर्दों को भी विदेशी महिलाओं की संस्कृति का ख़्याल रखना चाहिए। उन्हें दिन दहाड़े लुंगी, गंजी और लंगोट और ढीले इलास्टिक वाले अंडरवियर पहनकर नहीं घूमना चाहिए। वे चाहें तो रात में इन सब में से कोई एक पहनकर घूम सकते हैं क्योंकि रात में विदेशी महिला पर्यटकों से कहा गया है कि अकेली न निकलें। मगर धूप में अकेली निकल सकती हैं। अकेले या अपने दोस्त या पति के साथ। इसलिए आप मर्द जात बुशर्ट या टी शर्ट पहनकर ही बाहर निकलें। फुलपैंट या केप्री पहनें। बेपर्दा रहना ठीक नहीं है।

लुंगी और लक्स कोज़ी पहनने वाले मर्दों से अपील है कि वे धार्मिक स्थलों पर अच्छा और पूरा पहनकर जायें। पुजारी भी ऊपरी हिस्से को नग्न न रखें। अगर विदेशी महिलाओं ने देख लिया कि ये लोग ख़ुद ही कम कपड़ों में या बग़ैर कपड़ों के हैं तो उन्हें सदमा लग सकता है। आरोप लगा सकती हैं कि सरकार भेदभाव कर रही है। हम कुछ जगहों पर जेंडर आधारित भेदभाव में यक़ीन नहीं रखते हैं। लुंगी पहनें भी तो लुंगी की तरह पहनें। बार बार उठाकर या लपेट कर स्कर्ट न बनायें।

हम एयरपोर्ट पर विदेशी महिला से स्कर्ट ले लेंगे। बदले में उन्हें राजू लेडीज़ टेलर वाली दो जोड़ी सलवार क़मीज़ दे देंगे। आप मर्दों को अपने ख़र्चे पर फुलपैंट का इंतज़ाम करना होगा। संघ ने भी आपकी बातों का लिहाज़ कर हाफ पैंट त्याग दिया है। उनका यह लॉजिक मुझे पसंद आया है। जब विदेशी संस्कृति के कपड़ों को ही अपनाना है तो हाफ क्यों, फुल क्यों नहीं। मुझे नहीं मालूम हाफ पैंट भारतीय खोज है या किसी ने हमारी खोज धोती से हाफ पैंट बना डाला था। संघ की आलोचना हुई कि बेतरतीब सिले हाफ पैंट में शालीनता की कुछ कमी प्रतीत होती है तो संघ ने तुरंत ही बात मान ली। हाफ पैंट की जगह फुलपैंट आ गया। संघ ने यह त्याग भारतीय संस्कृति के अपर्यटकों के लिए किया है। क्या आप विदेशी महिलाओं के लिए लुंगी छोड़ फुलपैंट नहीं पहन सकते? वैसे फुलपैंट की जगह भारतीय संस्कृति वाली धोती भी ठीक रहती।

भारतीय मर्द निराश नहीं करेंगे। ये मेरा विश्वास है। आप अपनी मूर्खता सिर्फ औरतों पर लादने के लिए मशहूर नहीं है। आपने ख़ुद के ऊपर भी तमाम मूर्खताएं थोपी हैं। बकलोलपन भारतीय मर्दों का गहना है। मर्द अपनी रक्षा भले न कर पायें लेकिन औरतों के पहरेदार बने फिरते हैं। फिर भी रात को आपकी वजह से कोई न निकले तो आप भी दिन में उनकी वजह से न निकलें। भारतीय मर्द ‘स्कर्ट दोष’ के शिकार हैं। ख़ासकर छोटे शहरों के मर्द ‘स्कर्ट दोष’ के कारण अपराध कर बैठते हैं। अगर स्कर्ट न होती तो भारतीय मर्दों की शालीनता ही देखने लाखों महिलाएँ जर्मनी न जापान से आ जातीं। स्कर्ट ने मर्दों को निकम्मा कर दिया वर्ना ग़ालिब जी थे ये बड़े काम के।

भारत फ़िजी नहीं है जहाँ औरत और मर्द सुलु नाम की स्कर्ट पहनते हैं। जैसे हमारे पूर्वोत्तर की महिलाएँ पहनती हैं। भूटन वाले पड़ोसी भी स्कर्ट जैसा पहनते हैं। अगर भारतीय मर्द स्कर्ट से इतने आतंकित और पतित हैं तो वे फ़िजी से सुलु मँगा कर पहन सकते हैं। स्कर्ट के ऊपर भी टाई और कोट पहन सकते हैं। तमाम छोटे शहरों में लड़कियाँ स्कर्ट पहनकर ही स्कूल जाती हैं मगर वहाँ पर विदेशों से कोई महिला स्कर्ट पहनकर नहीं आ सकती। बड़े शहरों की बात ही कुछ और होती है। वहाँ के मर्द छोटे कपड़ों पर ध्यान ही नहीं देते।

हम अतिथि देवो भव: में यक़ीन करने वाले लोग हैं लेकिन भारत में हम लोग जिन देवी देवताओं के अतिथि हैं, उनका भी तो ख़्याल रखना है। हम इन बाहरी देव देवियों को कुछ भी पहनने की छूट नहीं दे सकते। इसलिए जो बाहरी देव हैं उनसे उम्मीद की जाती है कि ख़ुद को अतिथि से ज़्यादा न समझें। हम अतिथि का सत्कार ही नहीं करते, उन्हें सलवार भी दे सकते हैं । मल्लब पहनने की सलाह देते हैं।

नोट: हर बात को गंभीरता से न लिया करें। किसी ने कह दिया तो कह दिया। सफाई भी तो दे दी है। वैसे आगरा में हर साल करीब साठ लाख देसी विदेशी पर्यटक आते हैं। इनमें से साढें पाँच लाख विदेशी इस साल आए हैं। आगरा में पर्यटकों के लिए अलग से एक थाना है। 2007 में यह थाना बन गया था। जिस देश में जहाँ साठ साल में कुछ नहीं हुआ, वहाँ आगरा में नौ साल से पर्यटक थाना चल रहा है। वहाँ दर्ज शिकायतों के अनुसार इस साल जनवरी से लेकर अब तक थाने में सिर्फ चौदह एफ आई आर दर्ज हुई हैं। हमारे सहयोगी नसीम ने पता कर बताया कि छह विदेशी पर्यटकों ने दर्ज कराई हैं और आठ देसी। इनमें से ज़्यादातर मोबाइल लूटने की घटना है। कई मामलों में मोबाइल की बरामदगी हो गई है और गिरफ़्तारी भी। 


सिर्फ दो मामले विदेशी महिला पर्यटकों के साथ छेड़खानी के हैं। दोनों ही मामले में गिरफ़्तारी हुई है। साठ लाख पर्यटक जहाँ आते हों, वहाँ के हिसाब से यह रिकार्ड शानदार है। कई साल से बलात्कार की कोई घटना नहीं है। इसके लिए आगरा के लोगों को बधाई। पुलिस को भी। पर्यटक का ख़्याल रखें। इसलिए नहीं कि वे देव हैं। बल्कि इसलिए कि वे इंसान हैं। वैसे जिन देशों को अतिथियों को देव कहने का यह फ़ार्मूला नहीं मालूम है सबसे अधिक पर्यटक वहीं जाते हैं। फ्रांस, अमरीका, इटली, स्पेन मैक्सिको। भारत उन दस देशों में नहीं है जहाँ दुनिया में सबसे अधिक पर्यटक जानते हैं। इसलिए अतिथि देवों भव को ज़रूरत से ज़्यादा न घिसें। पता नहीं कौन कहाँ से क्या कुकर्म किये आ रहा है और हम सिर्फ अतिथि के नाम पर उसे देव बनाए जा रहे हैं।

(ये लेखक के निजी विचार हैं, रवीश कुमार एनडीटीवी के सीनियर एडिटर हैं, ये लेख उनके ब्लॉग "कस्बा" से)
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