आजा़दी से पहले और आज 70 साल बाद, हमें क्या करना था?, क्या किया?, क्या करना है?

हिंदू,मुस्लिम,सिख,ईसाई सब में एक लहू दौड़ रहा था वो आजा़दी का लहू,हिंदुस्तानी का लहू

मेहदी हसन एैनी का़समी

देवबंद।  स्वतंत्रता दिवस पर मुझे भी कुछ लिखना है,कुछ कहना है अपने उन हिंदुस्तानियों को जो आजा़दी से पहले एक फौलादी दीवार थे,जिसमें कुछ ईंट मुस्लिम के रूप में थे तो कुछ गारा हिंदू के रूप में,कुछ मसाला सिख व ईसाई के रूप में तो कुछ मैटेरियल में दलित व पिछडे़ जातियों के लोग थे ये वो एनेकता में एकता की ताक़त थी जिसने भारत के वीरों को एक सीसा पिलाइ हुयी दीवार बना कर अंग्रेजों के सामने ला खडा़ किया और 1799 में टीपू सुलता़न शहीद द्वारा बलिदान देकर छेडी गयी तहरीके आजा़दी को 1947 में देश से अंग्रेजो़ को खदेड़ कर आजा़दी व स्वतंत्रता के रूप में हम देश वासियों को एक ना खतम होने वाली ताक़त और स्फूर्ती देकर खतम किया। 

अब हम सभी 125 करोड़ हिंदुस्तानी प्रतिवर्ष समूचे राष्ट्र को उद्वेलित कर देने वाले“ स्वतंत्रता दिवस” समारोह धूमधाम से मनाते हैं। इस अवसर पर भारत छोड़ो आन्दोलन या देश आजा़द कराओ तहरीक का का याद आना स्वाभाविक ही है।भारत छोड़ो आन्दोलन का वह समय था जब हमारे लक्ष्योंऔर आदर्शों की निष्ठा ने राष्ट्र को एक सूत्र में पिरो दिया था। 

उस आन्दोलन के न तो जातियाँ ही आड़े आईं और न धर्म ही।हिंदू,मुस्लिम,सिख,ईसाई सब में एक लहू दौड़ रहा था वो आजा़दी का लहू,हिंदुस्तानी का लहू,देश को डाकुओं से छुडा़ने का जज़्बा,आखि़र एकजुट होकर,लाखों वीरों के बलिदान के बाद हमारा देश भारत आजा़द हो गया.
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यहां तक तो हम सब हिंदुस्तानी थे,हमारा नारा था.

"सारे जहां से अच्छा हिन्दोस्तां हमारा"

फिर ऐसा क्या हुआ कि  आजादी प्राप्त होने के बाद सामाजिक न्याय के सूत्रधार जाति-भेद की विषमता मिटाने के नाम पर व धार्मिक ठेकेदार धर्म के नाम पर जातिगत एवं धार्मिक विद्वेष और राजनैतिक मोर्चाबंदी को पुख्ता कर रहे हैं। आदमी को आदमी से दूर करने लगे हैं।

आजादी प्राप्ति से पूर्व के जो राष्ट्रीय लक्ष्य एवं मूल्य, जो आदर्श भारतीयों को सामूहिक रूप से स्फुरित करते थे, जैसे बिखर गए हैं। आत्मनिर्भरता के सुस्वप्न में देखा राष्ट्रीय स्वाभिमान जैसे आज विलुप्त हो गया है। हमारी राजनीति का तो लगता है, शील ही भंग हो गया है। आस्थाएं डगमगा रही हैं। सामाजिक न्याय का लक्ष्य मात्र भाषणों या फिर कागजों में सिमटकर रह गया है। 

आजादी प्राप्ति के बाद की राजनीति ने अवसरवादिता एवं शून्यवाद को ही जन्म दिया है। नीति और नीयत दोनों ही गुड़-गोबर हो गई हैं। मूल्यों के बिखराव के वर्तमान दौर में सभी राजनैतिक पार्टियाँ उठापटक में लगी हैं।

“ आओ! सरकार सरकार खेलें ” के खेल में लिप्त हैं। भारतीयता जैसे नैपथ्य में चली गई है। धर्मांधता, जातीयता, धन-लोलुपता जैसे कूकर्मों में देश का बडा़ हिस्सा लिप्त होता जा रहा है। 
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भारत जैसे स्वाभिमानी और विकासशील राष्ट्र के लिए यह गर्वित होने की बात नहीं है। भारत की आम-जनता के लिए यह हानिकारक ही सिद्ध होगी। समाज में हिंसा और भ्रष्टाचार निरंतर निर्बाध गति से बढ़ता जा रहा है। लोगों की मानसिकता हिंसक होती जा रही है। ऐसे में बेहतर प्रशासन की उम्मीद रखना मिथ्या विचार ही होगा।
यह देश का दुर्भाग्य ही कहा जाएगा कि भ्रष्टाचार संत्री से लेकर मंत्री तक अपनी पहुँच बना चुका है। 

सुनने को मिलता है कि आजादी प्राप्त होने से पहले देश में केवल पाँच प्रतिशत काला धन था जबकि आज देश में 80 प्रतिशत से भी अधिक काला धन है। यह निरंतर सिकुड़ती और कलुषित मानसिकता का ही परिणाम है। भ्रष्टाचार का ये आलम है कि कभी कोई भूखा शायद ही रोटी की चोरी करता होगा, किंतु आज अमीर और अमीर बनने के लिए चोरी करता है।सरकारी सौदों में पनपता भ्रष्टाचार करोड़ों-अरबों से कम नहीं होता। ऐसे तमाम घोटालों के पीछे किन-किन ताकतों का हाथ होता है, किसको नहीं पता? जब रक्षक ही भक्षक बन जाएं तो फिर कोई क्या कर सकता है? हाँ! अगर जनता ही एकजुट हो जाए तो कुछ बात बन सकती है।

इन्दिरा गान्धी का “ गरीबी हटाओ ” नारा, राजीव गान्धी का 21वीं सदी में प्रवेश करने का नारा, सत्ता में आई प्रत्येक राजनैतिक पार्टी, सत्ता में आने के बाद के 100 दिनों में मंहगाई कम करने का वायदा बड़े जोर-शोर से करती है किंतु मंहगाई है कि निरंतर बढ़ती ही जा रही है।तमाम के तमाम राजनैतिक वायदे आम-जनता की आँख में धूलझोंकने का काम करते हैं। मोदी जी का “ सबका साथ, सबका विकास” नारा एक जुमला ही सिद्ध हुआ है।
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100 दिन में काले धन की वापसी के वादे को भाजपा के अध्यक्ष “ एक राजनीतिक जुमला ” सार्वजनिक तौर पर स्वीकार भी कर चुके हैं। राजनैतिक मंचों से धार्मिक-घोष ने राजनीति में और कालिख घोल दी है। मनुवादी प्रयोगशाला में फला-फूला भारतीय समाज आज भी पूरी तरह साम्प्रदायिकता के चंगुल में फँसा हुआ है। साम्प्रदायिकता को लेकर जिस प्रकार की समस्या भारत देश में है, शायद ही किसी अन्य देश में हो। यह भी सत्य है कि विविधताओं और विभिन्नताओं से भरा भारत जैसा कोई दूसरा देश हो। जाति-दर-जाति से निर्मित हमारे सामजिक ढाँचे को देखकर सब दाँतों तले उँगलियाँ दबाते हैं।

जाति-प्रथा का सम्पूर्ण ढाँचा ही सामाजिक दृष्टि से ऊँच-नीच की मानसिकता पर आधारित है। वर्तमान में गौ-रक्षा के नाम पर हो रहे जातीय दंगे, मारपीट, और दलित जातियों की महिलाओं के साथ हो रहे निरंतर बलात्कार, सरकारी और सामाजिक स्तर पर अल्पसंख्यकों और दलितों के हितों की अनदेखी कोई नई बात नहीं किंतु वर्तमान सरकार के समय में तो अति ही हो गई है। भाजपा और भाजपा की पैत्रिक संस्था को लगता है कि शायद यह उनकी अंतिम सरकार होगी तभी तो वह अपने तमाम एजेंडों को इसी कालमें पूरा करने के फिराक में धार्मिक और जातीय दंगे भड़काने के काम जुटी है। सामाजिक वैमनस्य को बढ़ाकर सत्ता में बने रहना उनका एक मात्र मकसद बनकर रह गया है।

व्यापक स्तर पर जाति या मजहब आधारित सांप्रदायिक झगड़े भारत में बेशक नए लगते हों किंतु इसके मूल में जो घृणा-भाव काम करता है, वह नया नहीं है। अंग्रेजों के आने तक शायद यें बातें भारतीयों को ज्यादा परेशान न करती हों।विभिन्न जातियों के लोग कभी-कभार आपस में थोड़ी-बहुत गाली-गलौज तो कर लेते थे, किंतु इस प्रकार के द्वेष को देर तक न ढोते थे। आज जो भी सांप्रदायिक झगड़े भारत में हो रहे हैं, वे सब राजनीति की देन हैं। आश्चर्यजनक तो यह है कि जाति-प्रथा के पोषक ही आज जाति-पाँति के उभरने की बात करने लगे हैं। उनसे कोई तो पूछे कि भारत में जाति-पाँति का वर्चस्व कब नहीं था। अंतर केवल इतना है कि पहले का दलित लुट-पिटकर भी चुप रहने को बाध्य था, पर आज का दलित में जातीय चेतना जाग उठी है।
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वह सामाजिक न्याय और सम्मान पाने की बात पर उतारू है।हालिया हिंसक वारदातों पर प्रधान मंत्री की चुप्पी न केवल प्रधान मंत्री पद की गरिमा पर प्रहार है अपितु उनके गुप्त एजेंडे का खुलासा भी कर रही है। लगता है कि मोदी जी ने असामाजिक तत्वों को दलितों और अल्पसंख्यकों की आवाज को कुचलने की खुली छूट दे रखी है।गौरतलब है कि साम्प्रदायिक घृणा देश के स्वास्थ्यके लिए अच्छी नहीं है। पंजाब में सिख साम्प्रदायिकता,असम में बोडो समस्या,छत्तीसगढ़ में नक्सलवाद,और अब गाय के नाम पर तथाकथित गौ-रक्षकों का तांडव . तो कहीं कोई और समस्या, यह है आज के भारत में साम्प्रदायिकता का विकराल रूप। इन सबको पीछे छोड़ती हुई, एक और बड़ी समस्या है, साम्प्रदायिक ताकतों के सिर पर चढ़ा “ हिन्दू-राष्ट्र ” की स्थापना का भूत। 

पहले से ही जातियों में विभाजित जनता को किसी न किसी मुद्दे पर और बाँटना, विभिन्न वर्गों में मतभेदों को मनभेद में बदलना और उसे बढ़ावा देना सत्ता-लाभ प्राप्त करना ही आज की राजनीति की नियति बन गई है।
अगर देश की राजनिति का यही रुख रहा तो यह कहने में कोई हर्ज नहीं कि भारत आजा़दी के वक़त बनाये गये मूल सिद्दांतों से बहुत दूर होता जा रहा है. और यह भारत जैसे विशाल गणतांत्रिक देश के माथे पर एक कलंक है.जिसके पूर्ण रूप से जि़म्मेदार अवसरवाद की राजनीति करने वाली पार्टियां और उन्हें सपोर्ट करके कुरसी तक पहुंचाने वाली जनता है.

इसलिए इस मरतबा स्वतंत्रता दिवस पर ध्वज फहराने से पहले,वीर शहीदों को सलाम करने से पहले,हमें अपने गिरेबान में झांकना होगा, और यह सोचना होगा कि जिन मौलिक सिन्द्धांतों पर अम्बेडकर व गांधी,आजा़द व अशफाक़ ने हमें छोडा़ था हमने उस पर कितना अ़मल किया? और कितना बाकी़ है? क्या करना था? क्या किया है? क्या करेंगें? यह तय करना है कि देश को अवसरवाद, फासीवाद,मनुवाद और साम्प्रदायिकता से कैसे
पाक किया जाए? दलितों व अल्पसंख्यकों पर हो रहे उत्पीड़न, भष्ट्राचार,और बढ़ रहे हिंसा के मिजा़ज पर रोकथाम  कैसे हो?और देश की सेक्यूलरिज़म और लोकतंत्र की दीवारों को कैसे मज़बूत किया जाए? यह इस "स्वतंत्रता दिवस" पर वीर शहीदों के पवित्र लहू की पुकार है.जो एक फर्ज़ है और क़र्ज़ बन कर हमारे कांधों पर लटका हुआ है और इस क़र्ज़ को अदा करना ही आजा़दी में दी गयी कुर्बानियों का हसीन बदला साबित होगा. तो आइये इस सव्तंत्रता दिवस पर हम फिर से उस जि़म्मेदारी को अदा करने का हलफ़ दोहरायें जिसे गांधी व आजा़द,हुसैन अहमद मदनी व अम्बेडकर ने देश को अंग्रेजों के चंगुल से आजा़द कराकर अदा किया था.

जय हिंद,जय भारत,

लेखक.मेहदी हसन एैनी का़समी ( इसलामिक स्कालर व छात्र हायर इसलामिक एजूकेशन फैकल्टी दारुल उलूम देवबंद)
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आजा़दी से पहले और आज 70 साल बाद, हमें क्या करना था?, क्या किया?, क्या करना है?
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